International Journal of Hindi Research

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International Journal of Hindi Research
Vol. 7, Issue 5 (2021)

रिपोर्ताज परम्परा की तीन आरम्भिक रचनाओं की खोज


ऋषिकेश सिंह

ष्शोधष् विकासवादी सिद्धांत के अनुरूप एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। जिसके परिणामस्वरुप ना केवल नए विचारों एवं वस्तुओं की खोज संभव होती है बल्कि पूर्व स्थापित सिद्धांतए तथ्यए तत्व एवं वस्तु आदि की पुनर्व्याख्या तथा नवीन संस्करण का संपादन भी किया जाता है जिससे एक तरफ मानव जीवन में सुगमता एवं गुणवत्ता सुनिश्चित होती है तो वहीं दूसरी तरफ स्थापित परंपरा पर पुनर्विचार से उसमें उपस्थित रूढ़ियोंए मान्यताओं आदि का परिष्करण हो जाता है जिससे उस परंपरा में नए तथ्योंए विचारों एवं प्रमाणों से न केवल प्रमाणिकता एवं क्षेत्र का विस्तार होता है बल्कि नए आयामों का समाहिकरण भी होता है ष्डॉण् एसण् एनण्ष् गणेशन के शब्दों में कहें तोश् अनुसंधान की परिभाषा से ही स्पष्ट है कि विषय ऐसा होना चाहिए जिसमें नए सत्यों के उद्घाटन के लिए या पूर्ववत ज्ञात सत्यों के विस्तार सुधार के लिए गुंजाइश होश्।1 इस प्रकार देखा जा सकता है एसण्एनण् गणेशन भी शोध के आधार के रूप में दो प्रकारों को उद्घाटित करते हैं दृ ;1द्ध नई शक्तियों का उद्घाटन ;2द्ध दिए गए ज्ञात सत्य में विस्तार एवं सुधार। उदाहरण के तौर पर शुक्ल जी द्वारा साहित्येतिहास लेखन में नामकरण का उप.विभाजन नए सत्य का उद्घाटन है तो वहीं द्विवेदीजी जी द्वारा भक्तिकाल के उद्भव के संबंध में पूर्व स्थापित मान्यताओं की पुनर्व्याख्या कर उसे भारतीय चिंतन धारा का स्वाभाविक विकास के रूप में व्याख्यायित करना पूर्व ज्ञात सत्यों का विस्तार एवं सुधार है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र में दूसरे आधार के अंतर्गत खोज के दौरान अथवा सामग्री संकलन चरण के अंतर्गत प्राप्त रिपोर्ताज शैली की तीन आरंभिक एवं नई रचनाओं ;नई इस अर्थ में कि इनका वर्णन अभी तक रिपोर्ताज परंपरा के विकास में नहीं किया गया है।द्ध की विधागत लक्षणों के आधार पर पड़ताल किया जाएगा और साथ ही प्रथम रिपोर्ताज के विवाद की पुनर्व्याख्या भी की जाएगी।
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ऋषिकेश सिंह. रिपोर्ताज परम्परा की तीन आरम्भिक रचनाओं की खोज. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 5, 2021, Pages 15-20
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