International Journal of Hindi Research

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Vol. 7, Issue 5 (2021)

हिन्दी उपन्यासों में कामकाजी महिलाऐं और बाजारवादी संस्कृति


डॉ. तबस्सुम खान, वेदिका यदन लाल बनौठे

बाजारवादी दौर में तकनीकी विकास ने स्त्रियों को वह आजादी दी कि वे आत्मनिर्भर बने, उन्हें सूचना उपकरणों द्वारा तरह-तरह की जानकारियां मिली। इस क्षेत्र में मोबाइल एक अत्यन्त सहायक उपकरण है जिसके उपयोग से प्रदीप सौरभ के उपन्यास ‘‘मुन्नी मोबाइल’’ की नायिका कब मुन्नी से मुन्नी मोबाइल बन जाती है उसे स्वयं भी पता नहीं चलता। बिहार के एक गांव से दिल्ली के साहिबाबाद में आकर बसना उसके लिए आसान नही था- ‘‘बक्सर से आने के बाद उसने.... झुग्गी से मकान का सफर भी यहीं तय किया।’’ वह पहले एक घरेलू महिला की तरह अपनी गृहस्थी चलाती हैं। चूंकि महानगरीय सभ्यता का प्रभाव उस पर पड़ता है और वह बाजारवादी संस्कृति की लालसाओं और सपनों की दुनिया में जीने लगती है। उसकी महत्वाकांक्षाये उसे निरंतर आगे बढ़ने और पैसा कमाने का दबाव उस पर डालती गई।’’ पहली बार जब उसने स्वेटर बुनकर पचास रूपये कमाये तो उसने सपनों की झडी लगा दी। उसे लगा अब टी.वी. से लेकर फ्रिज तक अब उसके घर आ जायेगा। पचास रूपये से उसकी कमाई पांच सौ तक पहुंच गई।’’ मुन्नी को बाहर की दुनिया अच्छी लगने लगी। मुन्नी अब नर्सिंग का काम भी सीखने लगी। डा. शशि अवैध गर्भपात कराकर पैसे कमाती थी। मुन्नी भी इस काम में उसका साथ देने लगी।’’ गांव में नर्सिंग होम और डाॅक्टर न होने के चलते उसकी दुकान चल गई। मुन्नी मोबाइल इसी नर्सिंग होम में बतौर नर्स काम करने लगी। हजार रूपये उसकी पगार तय हो गई। वह भी केस लाने लगी। मोटा कमीशन खाने लगी। बाजारवादी संस्कृति के प्रभाववश मुन्नी कहीं भी चैन और आराम की सांस नहीं लेती। घरों में काम करते-करते मुन्नी प्रसिद्ध हो गयी थी। आनंद भारती के यहां काम करते हुए उसने नार्थ इण्डियन चाइनीज, इटैलियन, मैकिसमन आदि कई तरह की पाक कलाएं सीख ली थी। उसकी मांग बढ़ने लगी थी। ‘‘लेकिन उसके पास समय नहीं था। वह झाडू-पोंछा करने वाली महिलाओं को कुक बनाकर भेजने लगी। काम दिलाने के नाम पर पहली तनख्वाह का वह आधा हिस्सा बतौर कमीशन लेने लगी।’’ मोबाइल उसके लिए जादू की छड़ी से कम न था। मोबाइल पर ही सब कुछ तय करके वह काम करने लगी। उसे खुद पर गर्व होने लगा। वह कहती है- ‘‘पैसे कमाने के लिए लोग पढ़ाई करते है और मैं बिना पढ़े-लिखे पैसा कमा रही हूं। वैसे जिस दिन चाहूंगी दस्तखत करना सीख जाऊंगी।’’ अतः मुन्नी एक साहसी और स्वतन्त्र स्त्री है। वह अपने अधिकारों को भुनाना जानती है। पितृसत्ता की कोई जकड़न उस पर अपना अधिकार नहीं जमाती इसलिए वह सही मायने में एक स्वतन्त्र स्त्री हे परन्तु उसकी यह स्वतन्त्रता उसे महत्वाकांक्षाओं के उस मोड़ पर ले जाती है जहां से वह कभी वापस नहीं आ पाती। मौजूदा संस्कृति लोगों को पैसे की हवस और बाजार के आकर्षण के चलते गलत रास्ते अख्तियार करने पर मजबूर करती है। ‘‘तरक्की की मायने लम्बी कार, बडा बंगला है। पैसा ही माई-बाप है और पैसे को कोई साधारण आदमी सही-गलत काम किये बगैर हासिल नहीं कर सकता है।’’ वर्तमान व्यवस्था इंसान का बुरा करने के लिए प्रेरित करती है। नैतिकता की उसमें कोई जगह नहीं। मूल्य शब्द बेमानी हो गये हैं। पैसा हासिल करने का हर गलत रास्ता एक सच्चा रास्ता है।’’
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डॉ. तबस्सुम खान, वेदिका यदन लाल बनौठे. हिन्दी उपन्यासों में कामकाजी महिलाऐं और बाजारवादी संस्कृति. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 5, 2021, Pages 4-7
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