International Journal of Hindi Research

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International Journal of Hindi Research
Vol. 7, Issue 5 (2021)

अस्तित्ववाद: पाश्चात्य तथा प्राच्य चिंतन


डॉ. स्नेहलता दास

अस्तित्ववाद वैयक्तिकता के दर्शन पर आधारित है तथा व्यक्ति के अस्तित्व की स्थापना करता है। पाश्चात्य और भारतीय दोनों चिंतन क्षेत्र में इस दर्शन पर विचार हुआ है तथा साहित्यिक कृतियों में भी इसका प्रयोग हुआ है। पाश्चात्य अस्तित्ववाद के अनुसार अस्तित्व का महत्व तत्व यह सार से अधिक होता है। मनुष्य अपने जीवन में कई प्रकार के चुनाव करता है और इसी से वह अपना कर्म निर्धारित करता है। उसके कर्मसमूह से ही उसकी जागतिक स्थिति सिद्ध होती है। यही अस्तित्व का अर्थ है। मानव जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है मृत्यु। यह मानव की स्वतंत्रता पर रोक लगाती है। इसके अलावा अन्य सांसारिक की परिस्थितियाँ जैसे दुख संघर्ष आदि तथा उसकी प्रवृतियां, गुण, बुद्धि भी उसके नियंत्रण के बाहर हैं एवं उसकी स्थिति की अनिवार्य सीमाएं हैं। अस्तित्ववादी मानवीय स्थिति की अनिवार्य सीमाओं के रूप में मृत्यु, संघर्ष, दुख, सुख और प्रमाद आदि को स्वीकार करता है। मनुष्य मृत्यु से भागने की कोशिश करता है इसलिए मृत्यु दुर्घटना जैसी लगती है। मृत्यु से सारी सम्भावनाएँ नष्ट हो जाती हैं। सार्त्र ने फिर भी मृत्यु को संपूर्ण विनाश न मानकर उसे एक तथ्य के रूप में स्वीकार किया है। भारतीय चिंतन मृत्यु को जीवन का अविभाज्य अंग मानता है और उसे सार्थक बनाने के पक्ष में हैं। भारतीय चिंतन मनुष्य को शून्य में चीर भटकाव की व्यथा की अनुभूति नहीं कराती बल्कि चिर शांति की संभावना को जगाती है मोक्ष तक ले जाती है। अस्तित्ववादी के लिए यह संसार संघर्षमय है क्योंकि व्यक्ति अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए दूसरे को बाधक बनते देखता है और इसी से संघर्ष होता है और युद्ध भी होता है। यूरोप के महायुद्ध में सार्त्र की अनुभूति तथा महाभारत युद्ध में अर्जुन की अनुभूति एक जैसी है अर्थात अस्तित्व वादी चिंतन जीवन की सार हीनता को प्रमाणित करता है। अस्तित्ववादी चिंतन मानव जीवन की शुद्धता को महान बनाने का प्रयास करता है उसके अनुसार मनुष्य को अपने जीवन की व्यवस्था का अनुभव करके अत्यंत कम समय में अपने व्यक्तिगत जीवन को अर्थ देना चाहिए। अस्तित्व दी अपने विवेक अपने निर्णय शक्ति और सुअवसर के बल पर समान परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न व्यक्ति अलग-अलग रास्ते चुनते हैं। अस्तित्ववादी इसी चुनाव को उसका सार तत्व कहता है। वातावरण की परिस्थितियों पर व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं होता इसीलिए अस्तित्व वादी उसे नगण्य समझता है तथा अपने चुनाव को मुख्य मानता है। यही चुनाव ही उसके अस्तित्व का निर्माण करता है।
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डॉ. स्नेहलता दास. अस्तित्ववाद: पाश्चात्य तथा प्राच्य चिंतन. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 5, 2021, Pages 28-33
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