International Journal of Hindi Research

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International Journal of Hindi Research
International Journal of Hindi Research
Vol. 7, Issue 5 (2021)

वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों में अभिव्यक्त आर्थिक बोध


शिवाली शर्मा

आज़ादी के बाद हमारा देश ( भारत ) आर्थिक उन्नती की ओर अग्रसर हुआ परन्तु इसी उन्नती के भीतर आर्थिक उदारवाद, उपभोक्तावादी संस्कृति तथा भूमंडलीकरण जैसा अदृश्य मायाजाल छिपा हुआ है। हिंदी ग़ज़ल समसामयिक जीवन तथा सामाजिक जनचेतना से जुड़ी हुई ग़ज़ल है। समकालीन हिंदी ग़ज़ल में ग़ज़लकार वशिष्ठ अनूप महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। ग़ज़लकार वशिष्ठ अनूप ने देश के भीतर शोषण का शिकार हो रहे किसानों, श्रम का शोषण, भूख, अभाव, मज़दूरों और बेरोज़गार युवा की दबी हुई आवाज़ को विद्रोह रूप में सामने लाया है। बाज़ार का सबसे पहला शिकार विकासशील देश बन रहे हैं। पूँजीवाद, बाज़ारवाद, वैश्वीकरण आदि ऐसे अदृश्य दुश्मन हैं जो विकास करने वाले देशों को अन्दर ही अन्दर खोखला करने का प्रयास कर रहे हैं। उदारवाद की नीति के भीतर दास बनाने का शड्यंत्र रचा जा रहा है। वशिष्ठ जी ने अदृश्य दुश्मन पर कटाक्ष किया है।
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शिवाली शर्मा. वशिष्ठ अनूप की ग़ज़लों में अभिव्यक्त आर्थिक बोध. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 5, 2021, Pages 55-57
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