International Journal of Hindi Research

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International Journal of Hindi Research
International Journal of Hindi Research
Vol. 7, Issue 5 (2021)

हिन्दी ग़ज़लों में स्त्री विमर्श


आरती देवी

आज जब हिन्दी ग़ज़ल औरत से बातचीत करती है तो वह उससे प्रेम की बात नहीं करती बल्कि उसके अन्तर्मन में छुपी युगों की पीड़ा तथा उसके जीवन के अंधेर-बंद कमरों को खंगाल कर उसे दिशाबद्ध करती है। परिवार संस्था के कारण घर का सारा काम महिला ने संभाला तथा पुरुष बाहरी काम को संभालने लगा। धीरे-धीरे इस कार्य के विभाजन ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया कि स्त्री घर के अंदर ही महदूद रह गयी। हमारा समाज मातृसत्तात्मक से परिवर्तित होकर पितृसत्तात्मक सांचे में ढल गया। इस प्रकार समाज की संरचना पुरुष केंद्रित हो गई जिसमें स्त्री का अस्तित्व विलुप्त होता चला गया। बचपन से ही उसको समाज के रूढ़िवादी संरचना में ढालने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है तथा किशोरावस्था तक वह पूर्ण रूप से उस प्रक्रिया में ढल चुकी होती है। संघर्ष तथा शोषण दोनों स्त्री जीवन के अभिन्न अंग बन चुके हैं। न तो संघर्ष किए बिना अपने अस्तित्व को स्थापित कर सकती है और न वह कभी शोषण मुक्त हो सकती है। हिन्दी ग़ज़लों में स्त्री के अबला तथा सबला दोनों रूपों को उसकी समस्याओं तथा चुनौतियों के साथ बारीकी के साथ उसके जीवन की गाथा को उकेरा है।
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आरती देवी. हिन्दी ग़ज़लों में स्त्री विमर्श. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 5, 2021, Pages 68-72
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