International Journal of Hindi Research

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Vol. 7, Issue 5 (2021)

गँगाधर मेहेर के काव्य में प्रणय चेतना


डॉ. चिन्मयी मिश्र

गँगाधर मेहेर जी के काव्य की प्रणय चेतना आदर्श की नींव पर खडी है। सामाजिक परम्परा, नियम, संस्कृति, सभ्यता के अनुरूप इसको स्वीकारा गया है। प्रणय में उद्धामता, उत्सृंखलता को मेहेर जी ने कतई बरदास्त नहीं किया है। जहाँ कहीं वैसा हुआ है, उन प्रेमियों को किसी न किसी रूप से दण्ड देकर सुधरने को विवश कर दिया गया है और पाठकों तक यह संदेश पहूँचा दिया गया है वे इन प्रेमियों की तरह ऐसा प्रेम करेंगे तो उन्हें भी दण्ड मिल सकता है। प्रेमी के मन में प्रेम का अकस्मात जोर पकडना और उनको मुग्धावस्था तक ले चलना दर्शाता है कि प्रेमियों के मन में प्रेम का जबर्दस्त प्रभाव रहता है। फिर भी यदि उसे संयत नहीं बनाया गया तो तरह-तरह के दु:ख, विरह उनके जीवन में आनेवाले हैं। ऐसा हो तो प्रेमियों के जीवन का बहुत बडा हिस्सा, केवल प्रेम, प्रणय को लेकर संघर्षं करने में गुजर जायेगा। प्रेम एवं प्रणय में छल,प्रपंन्चता का स्थान नहीं है। यदि प्रणय संयत और आदर्शपुर्ण है तो प्रतिकूल परिस्थिति में समाज की हमदर्दी तथा मदद प्रेमियों को आसानी से मिल जाती हैं। प्रेमियों का प्रणय राम-सीता जी का जैसा होना चाहिये जो न केवल आदर्श प्रेम था अपितु त्याग से महिमामण्डित श्रेय-मयी प्रेय रचनात्मक ज्ञान-धारा का एक सुंदर निदर्शन था। प्रेम की गहराई के अनुसार प्रेमियों का मिलन सुखप्रद तथा आल्हाददायक बनता है।
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डॉ. चिन्मयी मिश्र. गँगाधर मेहेर के काव्य में प्रणय चेतना. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 5, 2021, Pages 79-86
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