International Journal of Hindi Research

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Vol. 7, Issue 5 (2021)

मछुआरा जीवन का संघर्ष और उनमें पनपते हुए राजनीतिक चेतना का विकास (नागार्जुन के द्वारा लिखित ‘वरुण के बेटे ’उपन्यास के विशेष संदर्भ में…)


राजीव कुमार बेज

भारत जैसे विशाल देश में अभी अनेक प्रांतीय अंचल उपेक्षित है । अब भी वे मुख्य जन प्रवाह से कटे हुए हैं । वहाँ आज भी संचार संसाधनों की कमी है । आधुनिक जीवन शैली एवं सुविधाएं उनके लिए दुर्लभ है । अशिक्षा,अभाव और जड़ता से उनका जीवन जर्जर है । अनेक जातियाँ अभी सूदूरवर्ती प्रदेशों में शताब्दियों पूर्व का जड़ जीवन व्यतीत कर रहे हैं । आज भी उन्हें जीवन की छोटी सी छोटी सुविधाएं दुर्लभ है । हम देख सकते हैं कि आज के कुछ लेखक प्रांतीय अंचल में बसने वाले मछुआरों के प्रति रूमानी दृष्टि नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं की दृष्टि से भी देख रहे हैं । ये वर्ग कई स्तरों पर हाने वाले उनके शोषण का पर्दाफाश कर रहे हैं । चाहे इन मछुआरा समाज के प्रति जमींदारों, भू स्वामियों तथा राजनीतिक पार्टियों का दृष्टि कोण कुछ अलग हो सकता है परंतु साहित्यकार कभी भी मूल्यवादी दृष्टि से विलग नहीं हुआ है । वह आज भी मानवता का प्रहरी है । वे निरंतर मानवीय संवेदनाओं का विस्तार करते हुए,जनता की लढ़ाई लढ़ रहे हैं । इसलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि अभी उपन्यास मरा नहीं है । जिससे हाशिए में रहने वाले लोगों के यथार्थ जीवन को लोगों के सामने अभिव्यक्ति मिल पा रही है । अतः कह सकते हैं जब तक समाज तथा सहित्य में जनजीवन की संश्लिष्ट गाथा की आवश्यकता रहेगी । तब तक उपन्यास के विकास की संभावनाएं भी बनी रहेंगी।
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राजीव कुमार बेज. मछुआरा जीवन का संघर्ष और उनमें पनपते हुए राजनीतिक चेतना का विकास (नागार्जुन के द्वारा लिखित ‘वरुण के बेटे ’उपन्यास के विशेष संदर्भ में…). International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 5, 2021, Pages 98-102
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