International Journal of Hindi Research

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ISSN: 2455-2232

Vol. 2, Issue 1 (2016)

हिंदी काव्य में अस्तित्व-बोध (प्रसाद, निराला और बच्चन के संदर्भ में)

Author(s): डाॅ0 गीता यादव
Abstract: हिंदी काव्य में अस्तित्वाद के प्रभाव को देखने की कोशिश प्रायः स्वातन्त्र्योत्तर युग से शुरू होती है, पर अस्तित्व का प्रश्न चूँकि मनुष्य की मूल प्रकृति से जुड़ा हुआ है इसलिए मानव-सृजित किसी भी साहित्य में इसकी खोज की जा सकती है। यद्यपि इसके त्रासमय रूप के दर्शन छायावादोत्तर काव्य से होने आरंभ होते हैं पर उससे पहले छायावाद से ही कवि का व्यक्तिवादी स्वर सुनाई देनेे लगता है। प्रसाद, निराला और बच्चन जैसे कवियों की रचनाओं का भाव-बोध यह प्रमाणित करता है कि स्वतंत्रता-पूर्व के हिंदी काव्य में ही अस्तित्ववादी चिंतन के बीज दिखाई देने लग जाते हैं। और यह चिंतन पश्चिम प्रेरित विचारधारा के अनुसरण-मात्र के ही रूप में नही है अपितु कवि के जीवन की परिस्थितियों के सहज प्रस्फुटन के रूप में है।
Pages: 04-06  |  1505 Views  580 Downloads
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