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VOL. 1, ISSUE 1 (2015)
कविता का आस्था लोक और ‘धरती ने दिये हैं बीज’ संकलन
Authors
डॉ. नन्दकिशोर मौर्य
Abstract
आज की कविता के परिदृश्य में जब चारों ओर ’कविता में समय’, ’कविता और हमारा समय’ तथा ’समय, हम और कविता’ जैसे पदबन्धों की आड़ में भारी-भरकम सिद्धान्तों का शोर मचा हो, शासकीय और कार्पोरेट जगत के ’साहित्यिक?’समारोहों में कविता रचाव के फ्रेम गढ़े जा रहे हों, ऐसे गड्डमड्ड समय में अशोक चन्द्र जैसे कुछ ही कवि हैं जो अकादमिक जड़ता को तोड़ कर कविता में जीवन की सचाई को पिरोने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं। यही कारण है कि युग की खुरदरी और सख्त स्थितियों का खुलासा करते समय कवि थोड़ा आक्रामक और बेचैन हो जाता है। शायद यही वजह है कि आलोचक अनिल सिन्हा ने अशोक चन्द्र की कविता पर विचार करते हुए उन्हें बदहवास समकालीन कवियों की पंक्ति में रखा है।
अशोक चन्द्र की कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है स्त्री की उपस्थिति ! अशोक चन्द्र की कविता में बाज़ार और उसकी राक्षसी शक्तियों के प्रभाव में पूरी दुनिया को दिखाया गया है। पाखण्ड, आडम्बर, अध्यात्म और अंधविश्वासों ने मनुष्य के विवेक को हमेशा कुंद करके रखा है। ईश्वरीय सत्ता और उससे जुड़े अंधविश्वासों ने सृष्टि के आरंभ से ही शोषण और अनाचार के अवसरों को फलने-फूलने का पूरा अवसर दिया है। अशोक चन्द्र की कविता इस बात का खुलासा करती है कि पूंजी और मुनाफा केंद्रित जीवन की यांत्रिकता ने मनुष्य की रागात्मक और कलात्मक संवेदना को आहत किया है।
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Pages:50-52
How to cite this article:
डॉ. नन्दकिशोर मौर्य "कविता का आस्था लोक और ‘धरती ने दिये हैं बीज’ संकलन". International Journal of Hindi Research, Vol 1, Issue 1, 2015, Pages 50-52
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