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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 3, ISSUE 2 (2017)
समकालीन हिन्दी साहित्य में पर्यावरणीय चिंतन का अनुशीलन
Authors
डॉ0 सत्येन्द्र प्रकाश, राघवेन्द्र प्रकाश
Abstract
वर्तमान में चारों ओर फैले हुए प्रदूषण को कम करनें हेतु हम कह सकते है कि प्राचीन एवं वर्तमान वैज्ञानिकों, पर्यांवरणविदों के समान ही हिन्दी साहित्य की काव्य परंपरा में कवियों नें पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन करते हुए लगातार समाज को इस ज्वलंत समस्या के बारे में जागरूक करने का प्रयास किया है और यह अनवरत जारी है। इतनी नीतियों के पश्चात् भी प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है तो अब यह समाज के लोगों की व्यक्तिगत् जिम्मेवारी बनती है कि हम इन सभी चिंतको के विचारों पर चलते हुए स्वयं इस बात हेतु प्रतिबद्ध हों कि- चाहे कुछ भी हो व्यक्तिगत रूप से वे स्वयं किसी भी प्रकार का अनावश्यक प्रदूषण नहीं करें और प्रकृति के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेवारी को समझते हुए अधिक से अधिक लोगों को पर्यावरण प्रदूषण के प्रति जागरूक करनें का प्रयास करें। प्रकृति संरक्षण हेतु साहित्य में जो उपाय बतलाये गए हैं उनके आधार पर इसके संरक्षण के लिए कार्य करे और ऐसी स्थिति उत्पन्न करें कि-

ओ ताजी हवा / तरंगायित करो हदय मेरा/ कि वह बंधनमुक्त हो/ हिलोरें ले उछले/फिर मिल जाए समुद्र से1

इस प्रकृति नें हमें जीवित रहनें के लिए हर एक सुविधा तथा सहूलियत प्रदान की है तो अब आज हमारे द्वारा इसके अति दोहन के कारण ये अपने अस्वस्थ्य रूप में हमारे सामनें है। तो अब हमें इसे पूर्ण रूप से स्वस्थ्य बनानें हेतु कारगर तथा ठोस प्रयास प्रारंभ कर देने चाहिए। कवि जितेन्द्र जलज कहते हैं कि-

जब जब जो जो चाहा /जो जो मांगा/ धरती नें कभी हाथों को/ संकुचित नहीं किया,
फिर ऐसा क्यों ? कि हम/अब दे नहीं सकते धरती को/ चिरायु के लिए,
प्रदूषण मुक्त पर्यावरण ?2

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Pages:112-115
How to cite this article:
डॉ0 सत्येन्द्र प्रकाश, राघवेन्द्र प्रकाश "समकालीन हिन्दी साहित्य में पर्यावरणीय चिंतन का अनुशीलन". International Journal of Hindi Research, Vol 3, Issue 2, 2017, Pages 112-115
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