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VOL. 6, ISSUE 1 (2020)
कवितावली:मानव जाति की पीड़ा से छटपटाहट का काव्य
Authors
सोनपाल सिंह
Abstract
आलोचकों ने तुलसी साहित्य को दो चरणों में विभाजित किया है। पहले चरण में आदर्शवादी, महाकाव्यात्मक एवं आध्यात्मिक उन्मेष की रचनाएँ हैं यथा ‘रामचरितमानस’, ‘जानकी मंगल’, ‘पार्वती मंगल’, ‘वैराग्य संदीपनी’, एवं ‘रामाज्ञा प्रश्नावली’ आदि। दूसरे चरण में तुलसीदास आदर्श से यथार्थ की ओर, महाकाव्यात्मक भव्यता से वेणुगीतात्मक (लिरिकल) वैयक्तिकता की ओर मुड़ते हैं जिससे वे अपनी आत्मकथा कहने तथा समाज की निर्भ्रांत आलोचना की नयी जीवन-दृष्टि पाते हैं। ‘गीतावली’, ‘कृष्णगीतावली’, ‘विनय पत्रिका’, ‘दोहावली’, ‘कवितावली’, और ‘हनुमानबाहुक’ आदि मुक्तक कृतियाँ इसी चरण की देन हैं। इस तरह की रचनाओं में आत्म-संवाद झलकता है। देखने की जरूरत यह है कि उनके ‘मैं’ अर्थात् कवि के अन्तःकरण का आयतन क्या है? उस ‘मैं’ का समाज से क्या रिश्ता है? वह ‘मैं’ कितना सामाजिक है? अन्तर्मुखी होते हुए भी वह आत्मविश्लेषण करने में कितना सक्षम है? इस ‘मैं’ की प्रकृति और आत्मविस्तार से ही किसी कवि की भक्ति-भावना के सामाजिक सरोकार को परखा जा सकता है। प्रस्तुत शोधपत्र में हमारा सरोकार कवितावली में विन्यस्त सामाजिक यथार्थ से है। कवितावली तुलसीदास की ऐसी रचना है जो अपने समय की सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक भयाभयता से हमें रू-ब-रू कराती है । इन संदर्भों में कवितावली तुलसीदास के समकालीन यथार्थ का एक विश्वसनीय दस्तावेज प्रतीत होती है ।
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Pages:34-36
How to cite this article:
सोनपाल सिंह "कवितावली:<em></em>मानव जाति की पीड़ा से छटपटाहट का काव्य<em></em>". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 1, 2020, Pages 34-36
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