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VOL. 6, ISSUE 6 (2020)
पुराणों में राष्ट्रीय भावना
Authors
डाॅ. अजित कुमार, सुनील कुमार
Abstract
राष्ट्रीय भावना का सम्बन्ध राष्ट्रभूमि की एकता और अखण्डता से गहरा होता है। अपने राष्ट्र और प्रत्येक वस्तु से स्नेह, आसक्ति और उसके प्रति गर्व की भावना भी राष्ट्रीय भावना के आवश्यक तत्त्व हैं। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में भारत भूमि का ऐसा ही राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत वर्णन हुआ है। इस अंश के तृतीय अध्याय में भारतभूमि का विस्तार, उसके पर्वत, वन, नदियाँ आदि वर्णित हैं और भारत का गौरवगान किया गया है।
पुराणों में इसे पुण्यभूमि कहा है जिसके गीत देवता भी गाते हैं। देवता कहते हैं कि धन्य हैं वे मनुष्य जिन्होंने भारतभूमि में जन्म लिया क्योंकि यही वह भूमि है जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों का मार्ग है। कारण यह है कि संसार के अन्य प्रदेश केवल भोग के निमित्त हैं। ज्ञान, कर्म और मोक्ष की आधारभूमि केवल भारत है। दूसरे शब्दों में इन गुणों का स्मरण कर देवता भी इस भूमि पर जन्म लेने के इच्छुक रहते हैं।
यथा-गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे, स्वर्गापवर्गास्पदभागभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्। [7]
इस भूमि का यह वैशिष्ट्य है कि लोग यहाँ फल की इच्छा किये बिना कर्म करते हैं। कर्मों को सर्वव्यापी परमात्मा में समर्पित करके, इस कर्मभूमि को प्राप्त कर वे शुद्ध चरित्र वाले होकर उस अनन्त परमात्मा में ही लीन हो जाते हैं-
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Pages:126-129
How to cite this article:
डाॅ. अजित कुमार, सुनील कुमार "पुराणों में राष्ट्रीय भावना". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 6, 2020, Pages 126-129
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