राजस्थान में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-1857
डाॅ. सुमन रानी मक्कड
सह-आचार्य, हिन्दी, स्व. प. न. कि.श.राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दौसा, राजस्थान, भारत
सारांश
अंगे्रजों ने भारत में 17 वीं सदी से व्यापारी के रूप में प्रविष्ट होकर निरन्तर अपने आर्थिक हितों की पूर्ति की ओर ध्यान दिया। सन् 1957 में प्लासी के युद्ध से लेकर 1957 की क्रान्ति तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का उद्देश्य भारत में निरन्तर साम्राज्य का विस्तार करना और भारतीयों का आर्थिक शोषण कर अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करना था। अपनी कुटिल चालों के द्वारा कम्पनी को वर्चस्व स्थापित करने में तो सफलता मिली किन्तु इससे भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति असंतोष चरम सीमा पर पहुंच गया। इस असंतोष के मूल में मुख्यतः ब्रिटिश हस्तक्षेप द्वारा प्रशासनिक, सैनिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में परम्परागत व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देना था। यह असन्तोष समय-समय पर विद्रोहों का कारण बना किन्तु ब्रिटिश सŸाा को जड़ से उखाड फैंकने का प्रथम व्यापक प्रयास 1857 का स्वतंत्रता संग्राम था। यद्यपि इस संघर्ष का आरम्भ योजनाबद्ध तरीके से 30 मई 1857 को करने का निश्चय किया गया था लेकिन असाधारण परिस्थितियों के कारण यह विद्रोह समय से पूर्व ही फूट गया। 29 मार्च 1857 में कलकŸाा की बैरकपुर छावनी के सैनिक मंगल पांडे ने चर्बों लगे कारतूस की खबर से अनुशासन भंग करते हुए दो ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों पर गोली चलाई, फलस्वरूप मंगल पंाडे को फांसी मिली, उसकी शहदत ने राष्ट्रमुक्ति के संघर्ष का मार्ग पूरी तरह तैयार कर दिया। 10 मई को मेरठ के विद्रोह ने 1857 की क्राति का बिगुल बजा दिया। जून, 1857 तक क्रांति की यह अग्नि लखनऊ, प्रयाग, कानपुर, बंगाल, दिल्ली, लाहौर, ग्वालियर, झांसी, काल्पी आदि मंे फैल गई। क्रांति की ज्वाला तीव्र गति से चारों ओर फैल गई। राष्ट्रवादी इतिहासकार मानते है कि यदि 1857 में राजस्थान और पंजाब के शासक अंग्रेजों का सहयोग नहीं करते तो संभवतः भारत मंे अंग्रेजी सŸाा की समाप्ति उसी समय हो जाती और देश की 90 साल की दासता जन्य मंजिल पार नहीं करनी पड़ती।
मूलशब्द: राजस्थान में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता सग्राम
प्रस्तावना
1857 की क्रांति आधुनिक भारत के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है। 1857 की क्रांति से पूर्व राजस्थान के शासकों ने अंग्रेजों से संधियां कर उन की अधीनता स्वीकार कर ली और ब्रिटिष सत्ता का समर्थन करते हुए क्रांति का दमन किया।
1857 की क्रांति पराधीनता की क्षंृखला को तोड़ने का प्रयास था जिसने समस्त उत्तरी भारत को हिला कर रख दिया। पराधीनता से मुक्ति के इस संघर्ष में देष ने अपने खोये हुए गौरव को पुनः प्राप्त करने की छटपटाहट थी। यद्यपि इस संघर्ष का आरम्भ योजनाबद्ध तरीके से 30 मई, 1857 को करने का निष्चय किया गया लेकिन असाधारण परिस्थतियों के कारण यह विस्फोट समय से पूर्व ही फूट गया।1
सन् 1848 में लाॅर्ड डलहौजी भारत का गर्वन-जनरल होकर आया। उसने भारत में अंग्रेजी राज्य के विस्तार हेतु एक नये सिद्धांत श्डाॅक्टरिन आॅफ लेप्सेजश् का प्रतिपादन किया। इस सिद्धांत के अनुसार यदि कोई राजा या नवाब निःसन्तान मर जाता तो उसकी रियासत जब्त की जाकर उसे ब्रिटिष भारत का अंग बना दिया जाता। इस नीति के फलस्वरूप सतारा, झांसी, नागपुर, अवध, कर्नाटक आदि रियासतें अंग्रेजों द्वारा जब्त कर ली गई। देषी राज्यों के शासकों में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई जो सन् 1857 की सैनिक क्रान्ति (गदर) के सामने आयी।
10 मई, 1857 को मेरठ की छावनी में भारतीय सेना ने विद्रोह कर देष में क्रांति का बिगुल बजाया। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार कई देषी राज्यों के शासकों एवं अन्य राष्ट्रीय शक्तियों के अंतिम मुगल सम्राट बहादुरषाह श्जफरश् के नेतृत्व में भारत से अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए शास्त्र उठायें। अंग्रेजों से देष को स्वतंत्र करने की दिषा में यह पहला बड़ा प्रयत्न था। इसी कारण इस क्रांति को भारत की स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध कहा जाता है। दुर्भाग्य से राजस्थान के अधिकांष राजाओं ने राष्ट्रीय शक्तियों का साथ न देकर अंग्रेजों की सहायता थी। इसका कारण उनका यह विष्वास था कि अंग्रेजी शासन की बदौलत ही उन्हें मरहठों, पिण्डारियों और उनके स्वयं के जागीरदारों से राहत मिली है।
बीकानेर के महाराजा रणजीतसिंह गदर में अंग्रेजों को सहायता देने में अग्रणी था। वह राज्य की सेना के 5000 घुड़सवार और पैदल लेकर पंजाब के हांसी, सिरसा और हिंसार जिलों में पहुँच गया, जहाँ भारतीय सेना की टुकड़ियाँ विद्रोह में शामिल हो गयी थी। बाड़लू नामक स्थान पर बीकानेर की सेना का विद्रोहियों से कड़ा मुकाबला हुआ, जिसमें विद्रोहियों को मात खानी पड़ी। पर बीकानेर की सेना को भी भारी क्षति उठानी पड़ी। उसके कई अधिकारी व सैनिक खेत रहे। राजस्थान के राजाओं में बीकानेर ही ऐसा अकेला राज्य था जहाँ का शासक स्वयं भी अंगे्रजों की सहायतार्थ विद्रोह को दबाने के लिए राज्य के बाहर चला गया। महाराजा की इन सेवाओं से प्रसन्न होकर अंगे्रज सरकार ने बीकानेर को टीबी परगने के 41 गाँव दिये।2
जयपुर के महाराजा रामसिंह ने भी गदर के दौरान अंगे्रजों की तन, मन, धन से सहायता की, जिसके फलस्वरूप गदर के अंत में अंग्रेज सरकार ने जयपुर को कोटपुतली का परगना स्थायी रूप से दे दिया।2
मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने अपनी सेना अंग्रेजो की सहायतार्थ नीमच भेजी। उस समय मेवाड़ की उक्त सेना में यह अफवाह फैल गयी कि सेना को दिये गये आटे में मनुष्यों की हड्डी का चूरा मिला दिया गया है। इससे सेना में विद्रोह की भावना भड़क गयी। महाराणा ने अपने वकील को नीमच भेजा। उसने सेना के जवानों के सामने उस आटे की रोटियां बना कर खाई, तब कहीं जाकर सेना को क्रोध शांत हुआ। महाराणा ने पोलीटिकल एजेन्ट और 40 अन्य अंग्रज स्त्री-पुरूषों को अपने महल जग मन्दिर में शरण देकर उनकी विद्रोहियों से रक्षा की।3
मेवाड़ के चित्तौडगढ़ जिले में निम्बाहेड़ा टोंक के नवाब का इलाका था। वहाँ हाकिम विद्रोहियों से मिल गया। इस विद्रोह को कप्तान सोबर्स ने मेवाड़ की सेना की सहायता से दबाकर नीम्बाहेड़ा का प्रषासन मेवाड़ राज्य को सौंप दिया। फरवरी, 1858 में विद्रोही नेता तांतियां टोपे अपने पांच हजार सैनिकों के साथ मेवाड़ में घुस आया, पर मेवाड़ की सेना ने अंग्रेजी सेना की सहायता से उसे भगा दिया। देष में विद्रोह समाप्त होने के बाद अंगे्रजों ने नीम्बाहेड़ा पुनः टोंक के नवाब को सौंप दिया। इससे महाराणा को बड़ी निराषा हुई। उसे आषा थी कि गदर में उसके द्वारा दी गयी सहायता के उपलक्ष में नीम्बाहेड़ा मेवाड़ को दे दिया जाएगा, पर उसे केवल श्खिल्लतश् से ही संतोष करना पड़ा।5
गदर में बांसवाडा के महारावल लक्ष्मण सिंह की सहानुभूति अंगे्रजों के साथ थी। तांतियां टोपे ने 11 दिसम्बर, 1857 को बांसवाड़ा को घेर लिया और उस पर अधिकार कर लिया। महारावल राजधानी छोड़ कर जंगलों में भाग गया। राज्य के सरदारों ने विद्रोहियों का साथ दिया। गदर की समाप्ति के बाद ही महारावल पुनः बांसवाड़ा लौट पाया।
डूँगरपूर के महारावल उदयसिंह द्वितीय ने गदर में अंग्रेजों की सहायता की। उसने खेरवाड़ा की छावनी के भील सैनिकों को विद्रोह में शामिल होने से रोका।
टोंक का नवाब वजी खां गदर के दौरान अंग्रेजों के साथ था, पर उसकी सेना का एक बड़ा भाग विद्रोहियों से मिल गया। नवाब के मामा मीर आलम खां ने विद्रोहियों का साथ दिया। नवाब के वफादार सैनिकों ने आलम खां की हवेली को घेर लिया। मुठभेड़ में आलम खां मारा गया। उसकी जागीर जब्त कर ली गयी। पर टोंक के 600 विद्रोही सैनिक मुगल सम्राट की सहायतार्थ दिल्ली पहुँचने में कामयाब हो गए। अगले वर्ष अर्थात् 1858 में तांतिया टोपे बंदा के नवाब के साथ टोंक पहुँचा। टोंक के एक जागीरदार नासिर मुहम्मद खां ने टोपे का साथ दिया। बनास नदी के किनारे और अमीरगढ़ के किले के निकट विद्राहियों और नवाब की सेना के बीच कई मुठभेड़ हुई। नवाब ने अपने को किले में बंद कर लिया। विद्रोहियों ने नवाब के दीवान फैज्जुल्ला खाँ को पकड़ लिया। उन्होंने टोंक के तोपखाने पर अधिकार कर लिया और जेल एवं कोतवाली से कैदियों को मुक्त कर दिया। विद्रोहियों ने टोंक राज्य पर अपने शासन की घोषणा कर दी और नगर को लूट लिया। सूचना मिलने पर दिल्ली से मेजर ईडन एक बड़ी सेना लेकर टोंक की ओर रवाना हुआ। विद्राही टोंक छोड़ कर नाथद्वारा की और चले गए।6
अलवर के महाराजा बन्ने सिंह ने आगरा के किले में घिरे घिरे हुए अंग्रेजों की स्त्रियों व बच्चों की सहायता के लिए अपनी सेना और तोपखाना भेजा। पर विद्राहियों ने अछनेरा के निकट उक्त सेना को घेर लिया। अलवर की सेना के कई अफसर व सैनिक मारे गए।
गदर के दौरान भरतपुर में महाराजा जसवंत सिंह ने नाबालिग होने के कारण राज्य का शासन अंग्रेजी पाॅलीटिकल एजेन्ट के हाथ में था। अतः भरतपुर की सेना तांतिया टोपे का मुकाबला करने के लिये अंग्रेजी सेना की सहायतार्थ दौसा भेजी गयी। परन्तु राज्य के मेवों और गुर्जरों ने विद्रोहियों का साथ दिया। फलस्वरूप राज्य में नियुक्त अंग्रेज अधिकारी छोड़ कर भाग गए। राज्य में ऐसा लगने लगा जैसे ब्रिटिष सत्ता समाप्त हो गयी हो। गदर शांत होने के बाद ही पोलिटिकल एजेन्ट ने राज्य में पुनः अपना वर्चस्व स्थापित किया।7
धौलपुर का महाराजा भगवन्त सिंह अंगे्रजों का वफादार था। अक्टूबर, 1857 में ग्वालियर और इन्दौर से लगभग 500 विद्रोही सैनिक धौलपुर राज्य में घुस गए। राज्य की सेना और कई वरिष्ठ अधिकारी विद्रोहियों से मिल गए। विद्रोहियों ने दो महीने तक राज्य पर अपना अधिकार बनाये रखा। दिसम्बर में पटियाला की सेना ने धौलपुर पहँुच कर विद्रोहियों का सफाया किया। राज्य पर पुनः महाराजा का वर्चस्व स्थापित हुआ।8
करौली के महाराज मदनपाल ने गदर के दौरान कोटा के महारावल को विद्रोहियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अपनी सेना भेज कर ब्रिटिष सरकार की खैरख्वाही का परिचय दिया। इसके उपलक्ष में करौली जैसी छोटी-सी रियासत के राजा को अंग्रेजों ने 17 तोपों की सलामी ओर जी.सी.आई. की उपाधि से विभूषित किया। 9
राजस्थान के अन्य राज्य जैसलमेर, सिरोही, बून्दी और शाहपुरा के शासन भी गदर में अंग्रेजों के वफादार रहे और उसके उपलक्ष में उन्होंने छोटी-मोटी रियायतें अथवा सम्मान प्राप्त किये।
राजस्थान में सन् 1857 की घटनाओं की एक ओर तस्वीर भी थी। 21 अगस्त 1857 को जोधपुर राज्य में स्थित एरिनपुरा छावनी में ब्रिटिष फौज के भारतीय दस्तो ने बगावत का झंडा खड़ा कर दिया। बागी सैनिक ए.जी.जी के सदर मुकम आबू पहुँच गए और वहाँ पर कर्नल हाॅल और कई अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। वहाँ से श्चलो दिल्ली, मरो फिरंगीश् के नारे लगाते हुए उन्होंने दिल्ली की ओर कूच किया। राह में उन्होंने मारवाड़ के एक बडे़ ठिकाने आहूवा पर मुकाम किया। वहाँ के ठाकुर कुषलसिंह चंपावत ने बागी सेना का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। आसोप, गूलर और आलनियावास के ठाकुर भी सदल-बल विद्रोहियों से आ मिले। इस प्रकार विद्रोहियों की सैन्य शक्ति लगभग 6 हजार हो गयी।
अजमेर के चीफ कमीष्नर पर पैट्रिक लारेन्स की प्रार्थना पर जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह ने अपने किलेदार ओनाड़ सिंह पंवार के नेतृत्व में 10 हजार फौजें और 12 तोपें विद्राहियों को कुचलने के लिए भेजी। पर विद्रोहियों के सामने राज्य की सेना नहीं टिक सकी। उसकी तोपों सहित सारी युद्ध-सामग्री व एक लाख रूपया विद्रोहियों के हाथों में पड़ गया।10 जोधपुर की सेना के सेनापति पंवार एवं उसके कई अफसर व सैनिकगण खेत रहे। अब सर पैट्रिक लारेन्स का पोलीटिकल एजेन्स मेसन ससैन्य आहूवा पहुँचे। 18 दिसम्बर को दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। अंग्रेजी सेना हार गयी। मेसन मारा गया। विद्रोहियों ने उसका सिर धड़ से अलग कर दीवार पर टांक दिया। लारेन्स अजमेर की ओर भाग गया।
उक्त समाचार जब गर्वनर जनरल लार्ड केनिंग के पास पहुँचा तो उसे बड़ी चिंता हुई। उसने 20 जनवरी, सन् 1858 को पालनुपर और नसीराबाद से एक बड़ी सेना आहूवा भेजी। क्रांन्तिकारी इस बड़ी सेना के सामने नहीं टिक सके। क्रांतिकारियों के नेता या तो पकड़ लिये गये या भाग गये। उनको जन-धन की अपार हानि उठानी पड़ी। आहूवा व अन्य ठिकानों को लूटा गया और बरबाद कर दिय गया। इसके पूर्व कि इस क्षेत्र में क्रांति का पटाक्षेप होता जोधपुर में एक ऐसी घटना घटी जिसने बुझते हुए दीपक की लौ की तरह काम किया। जोधपुर के शस्त्रागार में आग लग गयी। उससे ऐसा विस्फोट हुआ कि सारा नगर हिल उठा। कई मकान ढह गये। 500 से अधिक व्यक्ति मारे गए और हजारों घायल हुए। एक चार मन का पत्थर 6 मील दूर जा पड़ा। उस समय जोधपुर के किले में अजमेर और नसीराबाद से आये हुए अंग्रेज परिवार शरण पा रहे थे। विस्फोट की आवाज सुनकर उन्होंने समझ लिया कि विद्रोही नगर में आ गए और अन्त निकट है। पर जब यह पता लगा कि धमाका शस्त्रागार में हुए विस्फोट से हुआ है, तब कहीं जाकर उनकी जान में जान आई।11 बाद में जनता के मनोबल को कायम रखने के लिए राज्य में प्रचार करवाया गया कि शस्त्रागार में विस्फोट विद्रोहियों की करतूत से नहीं वरन् उस पर बिजली पड़ जाने से हुआ है।
आज भी आहूवा क्षेत्र की जनता निम्नलिखित लोक गीत के जरिये आहूवा में हुए संग्राम की याद यदा-कदा दिलाती रहती है।
श्ढोल बाजे चंग बाज।
भलो बाजे बांकियों।
एजेन्ट को मार कर।
दरवाजे पर टाँकियों।।
झूझे आहूवों येझूझे आहूवा।
मुल्का में ठावो हियो आहूवो।।12
कोटा राज्य में भी कोटा कण्टिनजेण्ट ने 15 अक्टूबर, 1857 को विद्रोह कर दिया। उन्होंने कोटा स्थित पालोटिकल एजेन्ट बर्टन और कतिपय अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। इसी समय स्थानीय फौज भी विद्रोहियों से मिल गयी। विद्रोहियों ने राज्य के कई इलाके अपने अधिकार में कर लिए। उन्होंने कोतवाली, राज्य कोष और रसद भण्डार पर अधिकार कर लिया एवं कोटा महाराव रामसिंह को नजरबंद कर दिया। करौली की सेना ने कोटा पहुँच कर महाराव को मुक्त कराया। विद्रोहियों का लगभग 6 माह तक राज्य के विभिन्न भागों पर अधिकार रहा।13 मार्च, सन् 1958 के कर्नल रार्बट के नेतृत्व में अंग्रेज सेना कोटा पहुँची। उसने विद्रोहियों का सफाया कर दिया। विद्रोहियों के नेता जयदयाल और महाराब खां फांसी के तख्ते पर लटका दिये गये। कोटा कण्टिनजेण्ट भंग कर दी गयी। बर्टन की रक्षा करने में लापरवाही बरतने के आरोप में महाराव की तोपों की सलामी 17 से घटा कर 13 कर दी गयी।14
अजमेर-मेरवाड़ा की नसीदाबाद छावनी में दो रेजीमेंट थी। मेरठ में सैनिक विद्रोह की खबर पाकर 2 मई को नसीराबाद स्थित दोनों पल्टनों ने विद्रोह कर दिया। विद्रोहियों ने अंगे्रज अधिकारियों के घरों को लूट लिया अथवा जल दिया। विद्रोही दिल्ली की ओर कूच कर गये जहां उन्होंने एक अंग्रेजी फौज को करारी षिकस्त दी। विद्रोही अगर दिल्ली की बजाय अजमेर जाकर वहाँ के शास्त्रागार पर अधिकार कर लेते और प्रषासन हाथ में ले लेते तो राजपूताने की रियासतों में विद्रोह को भारी बल मिलता और उस पर नियंत्रण पाना अंग्रेजी सल्तनत के लिये आसान न होता। पर देष के भाग्य में तो अभी गुलामी ही बदी थी।
स्पष्ट है 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में राजस्थान के राजाओं ने प्रायः अंग्रेजों का साथ दिया, पर यह भी स्पष्ट है कि राजस्थान की जनता और जागीरदारों की सहानुभूति विद्रोहियों के साथ थी। यही कारण था कि राजस्थान में विद्रोही नेता तांतिया टोपे को अनेक स्थानों पर महत्वपूर्ण सफलतायें मिली। कोटा, टोंक, बांसवाडा और भरतपुर आदि रियासतों पर तो महीनों तक विद्रोहियों का अधिकार रहा और उनका यह अधिकार तभी समाप्त हुआ जबकि देष के शेष भागों में क्रांति असफल हो गयी। यह केवल संयोग नहीं था कि तांतिया टोपे के राजस्थान में कई बार प्रवेष करने के बावजूद भी ब्रिटिष एवं रियासती सेनायें उसे पकड़ नहीं सकी।
अन्तोत्गत्वा विदेषी सेना को उखाड फैंकने के इस प्रथम बडे़ प्रयत्न में भारत असफल रहा, परन्तु इस विद्रोह के फलस्वरूप ब्रिटिष सरकार ने भारत का शासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी से हटाकर सीधा अपने हाथों में ले लिया। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया भारत की श्साम्राज्ञीश् घोषित कर दी गयी। ब्रिटिष सरकार ने राजाओं का निसंतान होने की स्थिति में गोद रखने का अधिकार बहाल कर दिया। राष्ट्रवादी इतिहासकार मानते है कि यदि 1857 में राजस्थान व पंजाब के शासक अंगे्रेजों का सहयोग नहीं करते हो संभवतः भारत में अंग्रेजी सजा की समाप्ति उसी समय हो जाती और देष को 90 साल की दासताजन्य मंजिल पार नहीं करनी पड़ती।15
सन्दर्भ सूची
1ण् डाॅ. सीमा गर्ग, डाॅ. सज्जन पोसवाल, 1857 का स्वतत्रंता संग्राम, जयपुर रितु पब्लिकेषन पृ. 45-46
2ण् करणी सिंह-दी रिलेसन्स आॅफ दी हाउस आॅफ बीकानेर विद सेन्ट्रल पावर्स -पृ 156-56
3ण् डाॅ. करणी सिंह-दी रिलेसन्स आॅफ दी हाउस आॅफ बीकानेर विद सेन्ट्रल पावर्स -पृ 156-56
4ण् बी.एल.पानगडिया -राजस्थान का इतिहास-पृ. 195
5ण् जगदीष सिंह गहलोत - राजपूताने का इतिहास-पृ. 279
6ण् जगदीष सिंह गहलोत - राजपूताने का इतिहास-पृ. 280
7ण् डाॅ. बी.डी.शर्मा-राजस्थान इन्स्टीट्यूट आॅफ हिस्टोरिकल रिसर्च के अप्रेल, 1966 के अंक में प्रकाषित श्टोंक और सन् 1857 के विद्रोहश् पर लेख।
8ण् बी.एल.पानगडिया - राजस्थान का इतिहास पृ. 276
9ण् नाथूराम खड़गावत - राजस्थान्स रोल इन दी फ्रीडस स्ट्रगल आॅफ 1857, पृ. 72
10ण् बी.एल पानगड़िया - राजस्थान का इतिहास, पृ. 171
11ण् महाराजा सर प्रतापसिंह का स्व-लिखित चरित्र -पृ 38-39
12ण् महाराजा सर प्रतापसिंह का स्व-लिखित चरित्र पृ. 38-39
13ण् ज्वाला (साप्ताहिक) ता. 2 सितम्बर, 1978 के अंक से साभार
14ण् डाॅ. मथुरालाल शर्मा -ष्कोटा राज्य का इतिहासष् , पृ. 629-30
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