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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
कीर्तन घोषा और सूर-सागर के गोपी-उद्धव संवाद का तुलनात्मक अध्ययन
Authors
जयश्री काकति
Abstract

महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव (सन 1449-1568) ‘एक शरण नाम धर्म’ के प्रवर्तक तथा असमीया भाषा-संस्कृति के पिता हैं। शंकरदेव के आगमन से पहले तक इस देश में तंत्र-मंत्र का अत्यंत प्रभाव था। शक्ति पूजा, शिव पूजा आदि का प्रचलन था। देवताओं को संतुष्ट करने के लिए निर्बलों को वलि दी जा रही थी। इन सबका विरोध करते हुए शंकरदेव ने एकईश्वरवाद की स्थापना की थी, जिसका मूल मंत्र है- ‘एक देव, एक सेव, एक बिने नाहीं केव’। शंकरदेव द्वारा प्रवर्तित नव-वैष्णव धर्म मूलतः कृष्ण भक्ति प्रधान है। उनकी रचनाओं को काव्य, भक्तितत्व विषयक ग्रंथ, अनुवादमूलक ग्रंथ, अंकीय नाट, गीत और नाम-कीर्तन-इन भागों में विभक्त किया जा सकता है। नाम कीर्तन के अंतर्गत कीर्तन घोषा आता है।

सूरदास हिंदी साहित्य जगत की सगुरण धारा के कृष्ण भक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं। अष्टछाप के प्रमुख कवि सूरदास श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। अंधे होने ने के बाद भी उन्होंने कृष्ण का रूप सौन्दर्य का वर्णन बड़े ही सजीव रूप से किया हैं। सूरदास ने श्रीमदभागवत के दशम स्कन्ध के आधार पर कृष्ण चरित्र का वर्णन किया है।

शंकरदेव तथा सूरदास अलग-अलग क्षेत्र के दो प्रसिद्ध वैष्णव कवि हैं। दोनों ही कृष्ण के अनन्य भक्त है। दोनों ने कृष्ण को लेकर अनेक रचनाएँ रची हैं। ‘भ्रमरगीत’ अथवा ‘गोपी-उद्धव संवाद’ एसा ही एक प्रसंग है। दोनों की विषय वस्तु एक होने पर भी दोनों मे भिन्नता देखी जाती है।

इस शोध-पत्र में उक्त विषय कीर्तन घोषा और सूर-सागर के गोपी-उद्धव संवाद का तुलनात्मक अध्ययन पर विस्तारपूर्वक चर्चा करने का प्रयास किया गया है।

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Pages:23-26
How to cite this article:
जयश्री काकति "कीर्तन घोषा और सूर-सागर के गोपी-उद्धव संवाद का तुलनात्मक अध्ययन ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 23-26
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