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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
‘इन्हीं हथियारों से’: आंचलिकता के तत्वों के परिप्रेक्ष्य में उपन्यास का अनुशीलन
Authors
ज्ञानेन्द्र मणि त्रिपाठी
Abstract

इन्हीं हथियारों से: आंचलिकता के तत्वों के परिप्रेक्ष्य में उपन्यास का अनुशीलन

ज्ञानेन्द्र मणि त्रिपाठी

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, किसान पीजी कॉलेज बहराइच, उत्तर प्रदेश, भारत

 

 

सारांश

अगर कोई अंचल का अर्थ ग्रामीण अंचल से लगाता है तो हमें उसकी बौद्धिकता पर संदेह करने का अवसर मिल जाता है। क्योंकि यह अंचल गाँव का भी हो सकता है और नगरों का भी। यह अंचल एक कस्बा भी हो सकता है,एक मुहल्ला भी।यह अंचल एक ग्राम भी हो सकता है,एक पूरा नगर भी और आंचलिक उपन्यास केवल ग्रामीण अंचल पर ही आधारित होते हैं यह यथार्थ नहीं है।आंचलिक उपन्यासों में किसी अंचल विशेष को कथा का आधार बनाकर वहाँ की सामान्य प्रवृत्तियों (उस अंचल की संस्कृति,मान्यता,मानवीय-स्वभाव,छल-कपट,ईर्ष्या-द्वेष,प्रेम-सहानुभूति,लोक-भाषा, लोक-व्यवहार तथा सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभाव एवं स्थिति) को व्यापक परिवेश में चित्रित करने का प्रयत्न किया जाता है। लेखक इन परिस्थितियों को राष्ट्र की सामान्य परिस्थितियों से सम्बद्ध कर पूर्ण और सार्वजनीन बनाने का प्रयास करता है।

 

मूल शब्द: ग्रामीण अंचल, आंचलिकता, आंचलिक संस्कृति, लोक व्यवहार मान्यता

 

 

प्रस्तावना

प्रेमचंद के उपन्यासों से सामाजिक कल्याण हेतु सचेष्ट उपन्यासों की जो परंपरा शुरू हुई थी वह किंचित परिवर्तनों के साथ स्वतन्त्रता परवर्ती हिन्दी-उपन्यासों में भी सुरक्षित है। अंतर केवल इतना हो गया है कि सामाजिक कल्याण का स्थान सामाजिक अध्ययन ने ले लिया है। प्रेमचंद के उपन्यास भारत की आत्मा के ग्राम निवासिनी होने का समर्थन करते हैं। गोदान को कृषक-जीवन का महाकाव्य कहा जाता है। बाद के कुछ उपन्यासकारों ने भी इनसे प्रेरणा लेते हुए गाँव को विस्तार और गंभीरता से अपने कथानक में उतारने का प्रयास किया।ग्राम्य-जीवन का समग्र चित्र प्रस्तुत करने वाले इन उपन्यासों को आंचलिक या ग्राम-मित्तिक उपन्यास की संज्ञा से विभूषित किया गया। फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आँचल के साथ हिन्दी उपन्यास की एक ऐसी ही नयी विचारधारा का शुभारंभ साहित्य जगत में हुआ।आंचलिक उपन्यासों के लिए यह प्रायः अनिवार्य माना जाने लगा कि उपन्यासकार उपेक्षित अंचल को नायक के रूप में प्रतिष्ठित करता हुआ वहाँ के पात्रों,समस्याओं,रहन-सहन, सम्बन्धों, विश्वासों, जीवन-संघर्षों आदि को रूपायित करे। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद जिन कथाकारों ने अपने मौलिक व्यक्तित्व से कथा-सृजन के क्षेत्र में नयी संभावनाओं को प्रकट किया और जिनकी रचनाओं से कथा-साहित्य के सुधी पाठकों को एक नयी ऊर्जा और उत्तेजना मिली,साथ ही साथ ही समीक्षकों को भी मूल्यांकन के नए आधार प्राप्त हुए,उनमें अमरकांत का स्थान अन्यतम है।आंचलिकता के अनिवार्य तत्वों के परिप्रेक्ष्य में हमें इनके उपन्यास इन्हीं हथियारों से का अध्ययन करना समीचीन होगा-

राष्ट्रीय स्वतन्त्रता-आंदोलन की प्रकृति के अनुरूप ही यह बहुनायक-संरचना वाला उपन्यास है, जिसके प्रमुख चरित्रों में नीलेश (छात्र), गोवर्धन (व्यापारी), सदाशयव्रत (पूर्व पहलवान-डाकू), नम्रता (मींदार की बेटी), भगजोगिनी (फल-विक्रेता की पत्नी), रमाशंकर (साधारण कार्यकर्ता), हरचरण (मजदूर), गोपालराम (दलित) एवं ढेला (वेश्या-पुत्री) है। तात्पर्य है कि समाज का कोई तबका, कोई समुदाय नहीं बचा जो इस आंदोलन में शरीक ना हुआ होयह उपन्यास इन्हीं मामूली लोगों,गुमनाम साधारण नायकों का विरुहै-उनके चारित्रिक उत्कर्ष और पतन को साथ-साथ अभिव्यक्त करता हुआ इतने नायकों वाले इस उपन्यास का महानायक बलियाजिले को कह सकते हैंवर्तमान उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग का एक पिछड़ा जिलाकिंतु बलिया प्रतिवादी, प्रतिरोधी और साहसी जनपद है,जो जीवन की कोमलताओं और राग-रंग से भी समृद्ध है। बलिया के शरीर की संपूर्णता और सजीवता में कुछ खास अवयवों व अंगों का योग है। वहाँ का प्राकृतिक-भौगोलिक चित्र, व्यक्ति समाज के पारस्परिक संबन्ध, अर्थ, शिक्षा, भावनाएँ, धर्म, संस्कृति, राजनीति आदि मिलकर बलिया की पूर्ण प्रतीति कराते हैं।

बलिया की वास्तविकता तक पहुँचने के लिए पाठकों को अनेक द्वार पार करने पड़ेंगे। इन द्वारों में जाति के,वर्ग के,धर्म के विभिन्न खंडों में बिखरे सूत्रों को समन्वित करने पर ही बलिया की आत्मा तक पहुंचा जा सकता है।लेखक ने जातिवाद के व्यापक प्रभाव को अपने लगभग सभी उपन्यासों में स्वीकार किया है किन्तु कहीं भी उसका समर्थन करता नहीं दिखता अपितु इस दीवार को तोड़कर सामाजिक ऐक्य की स्थापना का प्रयत्न करता हुआ अवश्य दिखता है।इन्हीं हथियारों से में चित्रित कुछ प्रमुख घटनाओं,कथनों और प्रसंगों का उदाहरण लेकर इन आंचलिक तत्वों की खोजबीन विवेच्य उपन्यास में करना समीचीन है-

 

वर्ग भेद तथा जाति भेद

इन्हीं हथियारों सेमें यह स्पष्ट रूप से दृष्टव्य है कि समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच, जाति–पाति की भावना पहले से शिथिल हो रही हैइसका प्रमुख कारण है शिक्षा का प्रचार-प्रसार होना। उपन्यास में सीतानाथ अपनी चाची को समझाता है- “प्रभु ने तो हर प्राणी को अपने हाथ से बनाया है,फिर कैसा भेदभाव….मन की शुद्धता,मन की ऊंचाई सबसे बड़ी चीज हैअगर तुम्हारा मन गंदा है, दूसरे की औरत पर गंदी नजर रखते हो, रोज रंडी के यहां जाते हो, शराब पीते हो और पाप करते हो-फिर खूब साफ-सुथरे रेशमी कपड़े पहनकर और रामनामी ओढ़कर मंदिर जाने पर तुम कहां के शुद्ध हुएऔर एक गरीब आदमी, हरिजन, भिमंगा शुद्ध मन से मंदिर में जाकर प्रार्थना करेगा तो उसे पूरा पुण्य मिलेगा दूसरी तरफ गोपालराम जो दलित युवक था और काफी अभावों के बावजूद अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए हाईस्कूल प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था,वह कांग्रेस की विचारधारा का विरोध करते हुए कहता है-“क्या आजादी मिलने पर वर्णाश्रम धर्म बना रहेगा?क्या आज का दबाया हुआ पिछड़ा,दलित और शूद्र समाज आजादी के बाद भी ऐसा ही बना रहेगा? गांधी बाबा हर चीज का बहुत आसान तरीका बताते हैंसमाज का ढांचा जो बना हुआ है उसे तोड़ना नहीं चाहते। स्वार्थ और संपत्ति के बढ़ते प्रभाव के कारण जातिवाद से भी भयंकर वर्ग-भेद के दुष्परिणाम ग्रामीण या शहरी-जीवन में दिखते है।जिसका निवारण केवल और केवल शिक्षा द्वारा ही संभव है जोकि इस विवेच्य उपन्यास में भी दिखता है कि विभिन्न तबके के पात्र शिक्षा प्राप्त करके सामाजिक-व्यवस्था की सड़ी-गली मान्यताओं पर प्रश्न उठाते हैं, उनमें सुधार की चाहत को आवाज देते हैं

 

स्त्रियों की सामाजिक स्थिति

ग्रामीण अंचल से संबन्धित एक और प्रकार के शोषण-नारी के शोषण का जिक्र भी इन्हीं हथियारों मेंउपन्यास में भगजोगिनी,भगजोगिनी की सास, ढेला, ढेला की मां श्यामादासी, धनेरी, कनेरी आदि अनेक स्त्री पात्र हैं,जो असहाय,आर्थिक रूप से कमजोर तथा परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने को विवश हैं। उनकी इसी आर्थिक विपन्नता की मजबूरी का फायदा पुरुष-वर्ग उठाता रहता हैदामोदर, भगजोगिनी के पति की मृत्यु के बाद,उसके घर में उत्पन्न आर्थिक समस्या का फायदा उठाते हुए उसकी मदद के नाम पर छोटी-छोटी सहायता देकर,उसका शारीरिक शोषण करता हैअसहाय और विवश भगजोगिनी अपने स्वाभिमान का गला घोटकर स्वयं को दामोदर के समक्ष समर्पित कर देती हैदूसरी तरफ दामोदर की पत्नी,जो दामोदर से कभी प्रेम न पाकर अपने को पूजा-पाठ में तल्लीन कर लेती है; वह कहती है- “एक स्त्री के लिए प्रेमी पति और प्यारे बच्चों की सेवा तो सबसे बड़ी पूजा है। आपके कुटेवों ने,आपकी कठोरता ने मेरे सभी अरमान नष्ट कर दिये हैं। मैं अपने को भूलने के लिए ही कंठी-माला पहनकर, पुजारिन बनकर चौबीसों घंटे घंटी टुनटुनाती रहती हूं

 

वेश्यावृत्ति

अमरकांत ने समाज में फैली इस असामाजिक दुष्प्रवृत्ति को विशेष रूप से अपने इस उपन्यास में स्थान दिया हैइन्हीं हथियारों से की पात्र ढेला,पेशे से वेश्या है,जो अपनी मां श्यामादासी के साथ इशरतगंज मोहल्ले में रहती है।चूंकि वह वेश्या है इसलिए उसकी मां उससे कहती है कि कभी किसी के प्यार-मोहब्बत में पने की जरूरत नहीं हैउसका पेशा केवल इतना है कि जो भी ग्राहक आता है उसे खुश करना और उससे पैसा कमानाढेला अपनी मां के स्वभाव से चिढ़कर कहती है-“तुम हो पक्की लालचीतुम्हें फायदा,अच्छा-बुरा,सेहत-तंदुरुस्ती किसी का कुछ भी ख्याल नहीं हैतुम किसी को आराम करते नहीं देख सकतीएक ढेबुआ के लिए तुम किसी की भी जान ले सकती हो।इसी लालच की वजह से अच्छा खाना-पीना भी नहीं मयस्सर हो रहा है किंतु ढेला की मां श्यामादासी को सामाजिक जीवन की गहरी समझ हैउसे अपने पेशे तथा आर्थिक हालातों का पूरा एहसास हैउसे यह भी पता है कि वैचारिक नैतिक मूल्यों,आदर्शों से कहीं अधिक आवश्यकता एक वेश्या को अपनी शारीरिक कीमत से हैवह कहती है- “बीमारी वगैरह के इलाज में काफी खर्च करना पड़ता हैफिर एक रंडी क्या खाएगी और क्या संतान को खिलाएगी? यही उसकी जिंदगी है, इसीलिए कहती हूं, रोना-धोना बंद करो, बहादुर बनो, होशियार बनो, तंदुरुस्त बनो, ऐसा न हो कि तुम्हें किसी के सामने गिड़गिड़ाना पड़े आगे समझाती है- पैसे निकलवाने के लिए नखरे,झूठ,फरेब रंडी का धरम हैयही समय है,जब बूढ़ी हो जाओगी, बीमार पड़ जाओगी तो कौन पूछेगा तुम्हें”? अपनी दयनीय आर्थिक दशा को व्यक्त करते हुए ढेला को बताती है- “यहां रंडी के पेशे में कोई फायदा थोड़े ही हैदोनों जून की रोटी-दाल चल जाती है, यही बहुत समझो। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने यह कटु सामाजिक यथार्थ सामने लाने का प्रयास किया, जहां नारी को अपनी आर्थिक मजबूरियों के कारण अपना शरीर बेचना पड़ता है और इसके बाद भी अच्छा रहन-सहन, खाना-पीना तथा स्वास्थ्य से उसे आजीवन वंचित रहना पड़ता हैयहां तक कि समाज के रईसों की भूख शांत करने वाली यह स्त्रियां अपना तथा अपने परिवार का पेट कितनी कठिनाई से भर पाती हैंइस प्रकार इस क्रूर अमानवीय व्यवस्था में आर्थिक और शारीरिक रूप से दोहरा शोषण नारी का होता है

 

अनमेल विवाह एवं स्वच्छंद प्रेम का निषेध

जिस तरह गोदान में होरी ने अपनी पुत्री रूपा का विवाह उससे उम्र में बड़े युवक के साथ केवल दहेज बचाने और रुपए प्राप्त होने की लालच में कर दिया था ठीक वैसा ही वाकया हमें इस उपन्यास में भी दिखता है।नीलेश के फूफा बेनी प्रसाद को जब पहली पत्नी से कोई संतान नहीं हुई,तो वे दूसरा विवाह कर लेते हैंवह जिस लड़की से विवाह करते हैं,वह मात्र 12 वर्ष की थीआर्थिक विपन्नता के कारण पिता ने अपनी अबोध पुत्री की शादी,उम्र में उसकी पिता के समान व्यक्ति से करके उस लड़की के प्रेम की तिलांजलि दे दीवह जिस लड़के से प्रेम करती थी उससे स्वेच्छानुसार विवाह नहीं कर पायी।ऐसा अक्सर ग्रामीण निर्धन परिवारों में देखा जाता है कि दहेज बचाने के चक्कर में लड़की का पिता या अभिभावक अपनी अवयस्क पुत्री तक को अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ ब्याह देता है।

 

सामाजिक मनोवृत्ति में परिवर्तन

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश में शिक्षा,संचार,व्यापार और यातायात के साधनों की उपलब्धता के कारण शहरी और ग्रामीण संस्कृतियों का सम्मिलन बहुत तेज़ी से हुआ जिसका प्रभाव यह हुआ कि अबतक की स्थापित सामाजिक,नैतिक,धार्मिक मान्यताओं और मानवीय मूल्यों का क्षरण होना शुरू हुआ जिसकी झलक इस समय के कथा-साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। इस उपन्यास की पात्र कनेरी विवाहोपरांत भी चनरा से संबंध रखती हैसदाशयव्रत जब चनरा के विषय में पूछता है तो कहती है- “मेरे करम जले दरिद्र बाप ने मुझे बूढ़े पेटमैन के हाथों बेच दियापर इस आदमी में कुछ है नहींऊपर से हमेशा खुर-खु किये रहता है।चनरा रेलवे में मजदूर है।, बाबू साहब, बड़ा नेक है, हिम्मती है,पक्का मर्द है, मौका बात पर जान देने वाला मन हैयही मेरा सब कुछ है। बलिया के धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक जीवन का लेखा-जोखा अमरकांत ने पर्याप्त विस्तार से प्रस्तुत किया है-

 

लोक-संस्कृति एवं लोकाचार

किसी भी उपन्यास की आंचलिकता के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व है उसमें वर्णित उस अंचल विशेष की लोक-संस्कृति और वहाँ के लोकाचारों को सम्यक वाणी और महत्व प्रदान करते हुए कथा में उद्घाटित करना,जिससे पाठकों को उस अंचल विशेष की मिट्टी की सोंधी सी महक उपन्यास को पढ़ते समय मिलती रहे।इस दृष्टि से अमरकांत ने अपने इस उपन्यास में लोक-संस्कृति के अभिन्न घटकों रहन-सहन, खान-पान, लोकाचार, लोक-व्यवहार आदि का चित्रण सम्यक दृष्टि से किया हैबलिया की तरफ पूर्वी यूपी में खान-पान में विभिन्नता को इस कथन से भलीभांति जाना जा सकता है-“अलग-अलग कटोरियों में आलू-परवल और चने की रसेदार सब्जी और छिछली तश्तरियों में खडेरा (बेसन की बर्फीनुमा तली सब्जी) पापड़, तिलोड़ी,चटनी,हरी मिर्च और कटी प्याज तथा नींबूगमकौचावल के दो कड़े लघु स्तूपों पर दो-दो रोटियां भी रखी थीं। थाली की दाल में पड़े घी, सब्जी के शोरवे की प्याज-लहसुन, लौंग, तेजपत्ता की मिली तीखी गंध और फरहर श्वेत भात की मिश्रित खुशबू कमरे और बरामदे में भर गईमकुनी नामक व्यंजन के बारे में लेखक बताते हैं- मकुनी बाटी की तरह ही होती हैपर वह गोल-गोल व छोटी होती है और उसमें सत्तू का भरता भरा रहता हैसारा कमाल भरते और मकुनी की सेंकाई में होता हैसाथ में आलू अथवा आलू-बैगन का चोखा चलता है इसके अलावा लेखक ने मगका लड्डू,ढूंढा,ढूँढी,तीसी का लड्डू, तीखुर का लड्डू, सूखी पापड़ी, मेथी का लड्डू, भूजा, मकई का परमल, सेवड़ा (नमकपारा) सूखी मूंगदाल मोंठ आदि खाद्य सामग्रियों का भी उल्लेख करके,उस क्षेत्र के खान-पान की संस्कृति से हमें अवगत कराया है

जीरादेई (नीलेश की दादी) के माध्यम से ग्रामीण परिवारों में बुजुर्गों द्वारा गायी जाने वाली ग्रामीण पंक्तियों का उल्लेख प्रसंगवश किया गया है, जिससे पाठकों को बलिया क्षेत्र के लोक-व्यवहार तथा वहाँ की बोली का आभास मिलता है-

 

भूल गइलीं दही-चिउरा,भूल गइलीं पूरी-हलवा,

तीन चीजुइया याद आवे,तीन चीजुइया याद आवे,

भूल गइलीं मेला-चकरी,भूल गइलीं झूला-घुमरी,

तीन चीजुइया याद….खाली तीन चीजुइया याद आवे

 

बेरोजगारी

आंचलिक उपन्यासों में वर्णित प्रायः ग्रामीण परिवेश में आर्थिक परावलंबन एक गंभीर समस्या के रूप में दिखता है।वहाँ के अनेक परिवारों में एक सी स्थिति होती है या तो घर में सभी स्त्री-पुरुष खेती के कामों में संलग्न होते हैं,जिसमें आय का स्रोत हमेशा अनिश्चित होता है क्योंकि यह ज़्यादातर मौसम के अनुसार फसल की पैदावार पर निर्भर करता है अथवा किसी एक कमाऊ व्यक्ति के भरोसे पूरा परिवार अपना जीवन-यापन करने को विवश होता है।इसका प्रमुख कारण है-अशिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी।इन्हीं हथियारों से में सीतानाथ अपने परिवार में एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति हैकचहरी की रोज की आमदनी से वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता है किंतु जब आंदोलन के दौरान कचहरी कुछ दिन के लिए बंद हो जाती है,तो उसके परिवार में राशन तक की किल्लत हो जाती है और सदस्यों को भूखे रहने या रुखा-सूखा खाने की नौबत आ जाती हैइस पर आनंदी सोचती है-“…..कचहरी बंद होने से आफत आ गई है..... अब कैसे काम चलाऊं”।लेखक ने बेरोजगारी से उत्पन्न कुंठा,खीझ,निराशा आदि मानसिक तनावों को नारी पात्रों के माध्यम से इस उपन्यास में रेखांकित किया है

 

राष्ट्रीयता का आदर्श

इन्हीं हथियारों से के बलिया में वर्णित राजनीतिक घटनाक्रम कई अर्थों में विशिष्ट हैं। एक तो ग्रामीण-जन की राजनीतिक चेतना का इनसे परिचय मिलता है, दूसरे अविश्वास की क्षीण रेखा भी मन में कौंधती है कि क्या सचमुच 1942-48 के बीच की अवधि में ग्रामीणों में राजनीतिक चेतना इस स्तर की थी?1942 के आंदोलन में बलिया क्षेत्र की जनता की सहभागिता ने इस आंदोलन का स्वरूप ही बदल दिया था। नायकविहीन होने के बावजूद इस उपन्यास में सभी आम साधारण नागरिक, देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सम्मिलित योगदान देकर राष्ट्रीयता के आदर्श की स्थापना करते हैंतत्कालीन वातावरण की एक झलक निम्नवत है-“आप लोग तैयार रहिये हर कुर्बानी के लिएयह आजादी की आखिरी लड़ाई हैहर स्तर पर ब्रिटिश सरकार से सहयोग करना होगाअहिंसात्मक तरीकों से ऐसा आंदोलन करना होगा,जो ब्रिटिश हुकूमत के तंत्र को एकदम नाकाम कर देरेल, संचार और परिवहन संबंध पूरी तरह से भंग और निरर्थक हो जाएं। थाने, कचहरी, कार्यालय और स्कूल सब निष्क्रिय हो जाएं। हां, इस विदेशी तंत्र को नष्ट करके उसकी जगह पर पूर्ण आजाद पंचायती प्रजातंत्र की स्थापना करनी होगी। आंचलिक उपन्यासों को लिखने की कोई भी शैली हो सकती है किन्तु सर्वाधिक सफल शैली चित्रात्मक शैली है,जिसमें उपन्यासकार एक फोटोग्राफर का रूप धारण कर उस अंचल का एक के बाद एक स्नैप-शॉट प्रस्तुत करता चलता है। अपने चित्रण को अधिक सत्य और विश्वासपूर्ण बनाने के लिए कथाकार उस अंचल की क्षेत्रीय भाषा, लोकगीत, परम्पराएँ, धर्मांधता, सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं का यथार्थ अंकन करता है और पाठकों में अपनी कथा के प्रति विश्वसनीयता उत्पन्न करने का प्रयास करता है।इन सभी अपरिहार्य आंचलिक तत्वों के परिप्रेक्ष्य में इस विवेच्य उपन्यास इन्हीं हथियारों से का अवगाहन करने पर स्पष्ट होता है कि अमरकांत जी ने इस वृहदकाय कृति में बलिया की आंचलिक संवेदना को बहुत यथार्थ रूप में आरेखित किया है।संवेदनशील पाठक इस उपन्यास को पढ़ते हुए बलिया की मिट्टी की महक को अपने मन मस्तिष्क में महसूस कर सकता है अस्तु यह कहना अतार्किक न होगा कि इस औपन्यासिक कृति को आंचलिक उपन्यासों की श्रेणी में स्थान दिये जाने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

 

संदर्भ ग्रंथ

  1. इन्हीं हथियारों से, अमरकांत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली (संस्करण-2016).
  2. हिन्दी उपन्यास: विविध आयाम, सं. डॉ. चंद्रभानु सोनवने, पुस्तक संस्थान, कानपुर (संस्करण-1977).
  3. उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा,डॉ.परमानंद श्रीवास्तव, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली (प्रथम संस्करण 1976).
  4. हिन्दी उपन्यास का विकास, मधुरेश, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद (संस्करण-2014).
  5. हिन्दी उपन्यास: अंतरंग पहचान,डॉ.प्रेमकुमार,गिरनार प्रकाशन महेसाना (प्रथम संस्कारण-1983).
  6. स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक उपन्यास, सुभाषिनी शर्मा, सजीव प्रकाशन, नई दिल्ली (प्रथम संस्करण 1976).
  7. उपन्यास शिल्प और प्रवृत्तियाँ, डॉ. सुरेश सिन्हा, रामा प्रकाशन, लखनऊ (प्रथम संस्करण-1965).
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Pages:19-22
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ज्ञानेन्द्र मणि त्रिपाठी "‘इन्हीं हथियारों से’: आंचलिकता के तत्वों के परिप्रेक्ष्य में उपन्यास का अनुशीलन ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 19-22
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