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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
कबीर के आदर्श समाज की परिकल्पना
Authors
दीपाली
Abstract
कबीर ने आदर्श समाज की परिकल्पना को पूरा करने के लिए समाज में जातिगत, धर्मगत, कर्मगत एकता की स्थापना के लिए मानव धर्म का प्रचार किया। आधुनिक कहे जाने वाले इस समाज में भी रूढ़िवादी, अंधविश्वासों, धार्मिक वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष भाव वैसे ही हैं, जैसे तब थे बल्कि अब इनका स्वरुप और भी अधिक विकराल होता जा रहा है। भारतीय समाज में दंभ, पाखण्ड, छल-छद्म, कपट, मिथ्याचरण का बोलबाला आज भी बरकरार है। समता और मानव एकता की विरोधी शक्तियां आज भी सक्रिय हैं। वर्ण-भेद और हिंसा को आज भी हम गले लगाये हुए हैं। हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य भी भले ही बाहर से प्रकट न हो रहा हो पर भीतर ही भीतर सब कुछ को ख़ाक करने में लगा है जिसका जीवंत उदाहरण मुजफ्फरपुर और दिल्ली में होने वाले सांप्रदायिक दंगे माने जा सकते हैं। कबीर ईर्ष्या, द्वेष धार्मिक पाखंड और जातिगत ऊँच नीच, अभिमान के भाव से रहित पतिव्रता नारी, अनुरक्त भक्त, आचारवान साधू, निरामिष वैष्णव, समदर्शी पंडित, निर्धनता में भी परमात्मा के प्रति आस्थावान, निर्लोभी, शीलवान, कर्मठ, सत्यवादी साधुसेवा आदि से निर्मित समाज को आदर्श समाज की कोटि में रखते हैं। कबीर जीवन को वैयक्तिक स्तर पर ही नहीं सामाजिक स्तर भी सात्विक बनाने का परामर्श देकर आदर्श समाज की नींव को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करते हुए विकास की दिशा का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
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Pages:81-83
How to cite this article:
दीपाली "कबीर के आदर्श समाज की परिकल्पना ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 81-83
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