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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
विष्णु नागर के साहित्य में प्रगतिशील चेतना
Authors
डॉ. रंजना
Abstract
विष्णु नागर समकालीन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं| उनका साहित्य वस्तुतः प्रयोग धर्मी है| आपका साहित्य आपके जीवन और विचारधारा से गहराई तक जुड़ा है। फिर लगभग 30 वर्षों से कविता के क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा उन्होंने एक साथ एक समर्थ कहानीकार, व्यंगकार, टिप्पणी लेखक पत्रकार होने का सबल प्रमाण दिया है। चौकन्नापन विष्णु नागर का स्वभाव है| आधुनिक हिंदी साहित्य में 'प्रगति' शब्द का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है। प्रगति अंग्रेजी के प्रोग्रेस का हिंदी रूपांतरण है जिसका अर्थ है विकास करना, निरंतर आगे बढ़ना| संस्कृति कोशों में 'प्र 'उपसर्ग पूर्वक गम् धातु लगाकर बने हुए शब्द मिलते हैं, जैसे प्रगम, प्रगमन, प्रगमननम तथा प्रगत। 'प्रगम' का अर्थ है आगे बढ़ना, उन्नति करना या प्राप्त करना आदि| कार्ल मार्क्स ने प्रगति को विशिष्ट अर्थ प्रदान किया है। उन्होंने स्वीकार किया है कि प्रगति में गति का प्रभाव होता है| प्रगति आगे बढ़ने का नाम है, लेकिन ऐसी प्रगति अधूरी है जो एकमात्र आगे बढ़ने का नारा लगाती हुई चलती है। एक विशिष्ट दिशा में आगे बढ़ना ही प्रगति का सच्चा स्वरूप है। प्रगतिशील चेतना भारतीय संस्कृति के विकास की अगली कड़ी है| भारतीय साहित्य को प्रगतिशील चेतना मार्क्सवाद या किसी विदेशी संस्करण की देन नहीं अपितु प्रगतिशील चेतना की जननी भारत की अपनी विषम परिस्थितियां हैं। प्रगतिशील कविता को ही लोकवादी और जनवादी कविता कहा जाता है। आज का प्रगतिशील कवि लोकवादी, जनवादी कवि है। प्रगतिशील चेतना प्राचीन के प्रति नवीन का आग्रह है। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य में इस प्रगतिशील जीवन दृष्टि के प्रवेश की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। प्रेमचंद के उपन्यास और उनकी कहानियां तो प्रगतिशील हिंदी साहित्य की बहुमूल्य निधि हैं। साहित्य में प्रगतिशील चेतना का उदय अपनी संपूर्ण तेजस्विता और गरिमा के साथ सन 1936 ईस्वी से माना जाता है| सन 1935 ईस्वी में एम फास्टर के सभापतित्व में पेरिस में 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन' नामक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का प्रथम अधिवेशन हुआ| सन 1936 ईस्वी में सज्जाद जहीर और मुल्क राज आनंद ने भारतवर्ष में अपने प्रयत्नों द्वारा 'प्रगतिशील लेखक संघ' की स्थापना की| प्रेमचंद्र की अध्यक्षता में लखनऊ में इसका प्रथम अधिवेशन हुआ। विष्णु नागर के साहित्य की विशेषता आधुनिक एवं प्रगतिशील है। उन्होंने अपने साहित्य में मध्यमवर्गीय जीवन की समस्याओं को रेखांकित किया है। आम आदमी के जीवन में घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक घटनाओं को बड़ी सजीवता के साथ लिया है क्योंकि उसका अंतरराष्ट्रीय महत्व है। आपने आम आदमी के जीवन की परेशानियों को बड़ी ही जीवंतता से अभिव्यक्त किया है।
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Pages:08-10
How to cite this article:
डॉ. रंजना "विष्णु नागर के साहित्य में प्रगतिशील चेतना ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 08-10
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