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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
कबीर काव्य में प्रेम और विरह
Authors
शतदल मंजरी
Abstract
प्रेम मानव मन और जीवन की कोमलकान्त सूक्ष्म अन्तः भावना का नाम है। प्रेम के अभाव में मानव-जीवन और उसके विकास की कल्पना कर पाना ही संभव नहीं है। "प्रेम को सृष्टि का मूल एवं आदि तत्त्व कहा गया है। उसका क्षेत्र विस्तार सर्वाधिक विस्तृत स्वीकारा गया है। जहाँ तक निर्गुण-सगुण किसी भी प्रकार की भक्ति या आध्यात्मिक साधना का प्रश्न है, वहाँ श्रद्धा-प्रेम के समन्वित रुप को ही 'भक्ति' कहा गया है और श्रद्धा-प्रेम-समन्वित भक्ति भाव को ही अध्यात्म साधना का मुख्य द्वार अभिहित किया गया है।"(१) प्रेम-तत्त्व जीवन की समस्त साधनाओं की अन्त: धमनियों में अन्त: सलिला के समान आद्यन्त परिव्याप्त रहनेवाला परम पवित्र और परम सूक्ष्म तत्त्व है। कबीर तो क्या, भक्ति काल का निर्गुणवादी या सगुणवादी कोई भी कवि एवं साधक प्रेम-तत्त्व एवं इसकी अन्त: साधना से शून्य अथवा विरहित नहीं है। सभी प्रकार की भक्ति-योग में भी उसका अस्तित्त्व असंदिग्ध रुप से स्वीकार किया जाता है। संत-साधना के मूल में भी नींव के समान प्रेम-तत्त्व का व्यापक अस्तित्त्व विद्यमान है, सभी संतों ने इस बात को मुक्त भाव से स्वीकार किया है। सभी संत कवि और साधक अपनी भावगत मूल अवधारणा में भक्ति के मार्ग को प्रेम का मार्ग ही मानते हैं। उनकी मान्यता है कि "इस मार्ग पर चल पाना सहज नहीं, बल्कि तलवार की धार पर चलने के समान ही अत्यंत कठिन है। इसी वस्तु सत्य की ओर स्पष्ट इंगित करते हुए संत प्रवर कबीर ने कहा है- "यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं। सीस उतारे भुई धरे? तब पैठे घर माहिं।।"(२) मीरा ने भी प्रेम के मार्ग को 'सूली ऊपर सेज पिया की' कहा है। यहाँ तक पहुँचने क लिए सीस उतारकर भूमि पर रखना पड़ता है अर्थात् सभी प्रकार के स्वार्थों, अहंभावों का त्याग कर आत्म-बलिदान का मार्ग अपनाना पड़ता है। तब कहीं जाकर इस प्रेम के क्षेत्र में प्रवेश संभव हो पाता है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि "निर्गुणवादी संतमत एवं कबीर ने प्रेम-तत्त्व सूफी-साधकों-कवियों से अधिगृहित किया है; परंंतु साधना की प्रक्रिया भारत में आरंभ होने से पहले भी यहाँ के भक्ति संबंधी सैद्धांतिक ग्रंथों में प्रेम-तत्त्व का व्यापक वर्णन मिलता है। मधुरा भक्ति या प्रेमा भक्ति अथवा कान्ता भाव की भक्ति आदि की समस्त अवधारणाएँ वस्तुतः प्रेम-तत्त्व पर ही आधृत है। श्रीमद्भागवत् तक में प्रेम की अनन्यता का व्यापक वर्णन मिलता है।"(३)
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Pages:116-120
How to cite this article:
शतदल मंजरी "कबीर काव्य में प्रेम और विरह ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 116-120
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