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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
संत कबीरदास (भक्तिकालीन) एवं संत मगनीराम (रीतिकालीन) की साखियों में भक्ति-भावना
Authors
शतदल मंजरी
Abstract
हिन्दी साहित्येतिहास में युग को कवि का निर्माता माना गया है। अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि एवं आलोचक मैथ्यू ऑर्नल्ड ने कहा है कि "कवि और युग परस्पर प्रतिक्रियावादी होते हैं।"(१) युग की परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप ही कवि का आविर्भाव होता है। कवि कुछ युग से सीखता है और कुछ *युग* उन्हें सिखाता है। युग परिस्थितियाँ एवं आवश्यकताएँ जैसी भी हो परंतु मानसिक वृत्तियाँ देश और काल के बंधनों से दूर रहकर समान बनी रहती है। उनमें जो विषमताएँ मिलती है वे देश और काल के कारण होती है। भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में भक्तिकालीन कवि कबीरदास ऐसे ही महान~ विचारक एवं प्रतिभाशाली कवि हैं जिन्होंने शताब्दियों की सीमा का उल्लंघन कर दीर्घकाल तक भारतीय जनता का पथ आलोकित किया और सच्चे अर्थों में जन-जीवन का नायकत्व किया। महात्मा कबीर के समय में भारतवर्ष राजनीतिक] सामाजिक] धार्मिक और आर्थिक रुप से सर्वत्र एक अशांति और अव्यवस्था का साम्राज्य होने के बावजूद उन्होंने भारतीय समाज में दोनों धर्मों के बीच पारस्परिक सौहार्द्र को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसी प्रकार संत मगनीराम भी कबीर के अनुकूल रीतिकालीन प्रथम चरण के महत्त्वपूर्ण कवि रहे हैं। दुर्भाग्य से ये हिन्दी साहित्येतिहास के छूटे एवं भूले-बिसरे तथा अज्ञात एवं अप्रकाशित कवियों में से एक हैं] जिनकी पांडुलिपियों का प्रकाशन आज के वयोवृद्ध साहित्यकार डॉ. अवधेश्वर अरुण जी के प्रयास से २००९ ई०.में हुआ है जो वज्जिका भाषा में रचित है। इनकी रचित साखियों की संख्या १४२३ है, जिनपर कबीर की स्पष्ट झलक दिखलाई पड़ती है। इसलिए संत मगनीराम के साहित्य में भी कबीर की तरह सगुण और निर्गुण ईश्वर से संबंधित अनेक बातों का उल्लेख मिलता है। जहाँ एक ओर वे राम] कृष्ण हरि इत्यादि की वैष्णव भक्ति करते हैं और उनकी शरणागत होने की भी बात करते हैं वहीं दूसरी ओर अनेक स्थान पर उन्होंने निर्गुण के प्रति आग्रह व्यक्त किया है। यथा --- **आदि-अंत औ मध्य है सरगुन सत्य जुगादि। निर्गुण रहित त्रिकाल है मगनीराम अनादि।।"(२) मगनीराम की दृष्टि सगुण और निर्गुण को लेकर समन्वय की रही है इसलिए एक जगह वे सगुण और निर्गुण को दो आँखों की भाँति पूरक मानकर कहते हैं --- **सर्गुण निर्गुण दोई है कहने को ज्यों आँखि। देखे एक ठौर वे मगनीराम साखी ।।" (३) इस प्रकार] अलग-अलग काल से प्रभावित संत कबीर दास और संत मगनीराम की भक्ति भावना का दर्शन अलग-अलग रूपों में किया जा सकता हैA
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Pages:93-97
How to cite this article:
शतदल मंजरी "संत कबीरदास (भक्तिकालीन) एवं संत मगनीराम (रीतिकालीन) की साखियों में भक्ति-भावना ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 93-97
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