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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
संत कबीर और संत मगनीराम के राम में वैषम्य
Authors
शतदल मंजरी
Abstract
भक्तिकाल के कवियों ने ईश्वर के दो रुपों की उपासना की है। कबीर ने जहाँ निर्गुण ब्रह्म को अपना आराध्य बनाया वहीं रीतिकालीन संत मगनीराम ने अपनी साखियों में कबीर परंपरा एवं आदर्श को संजोए रखने के बावजूद सगुणरुप को अपनी भक्ति का आधार बनाया है। 'राम ' का नाम कबीर ने भी लिया और मगनीराम ने भी लिया, किंतु कबीर के राम और मगनीराम के राम में अंतर है। कबीर ने निर्गुण, निराकार, अजन्मा, अरूप, अलख ब्रह्म को ही 'राम' के नाम से संबोधित किया है, जबकि मगनीराम के राम विष्णु के अवतार हैं : राम अयोध्या कृष्ण है मथुरा बिस्नु प्रयाग। कासी मगनीराम हर सुमिरत दुविधा भाग।। () कबीर अवतार वाद में विश्वास नहीं करते। कबीर के राम तो घट-घट बासी, सूक्ष्म तत्त्व हैं। वे 'राम' नाम के जप पर विशेष बल देते हैं। कबीर के राम दशरथ पुत्र नहीं हैं। वे बार-बार यह कहते हैं कि: दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना। राम नाम का मरम है आना।। () कबीर की भाँति मगनीराम भी राम-नाम के गायक और नामोपासक भक्त हैं। इन्होंने भी राम-नाम महिमा को अपने काव्य में सर्वाधिक महत्त्व दिया है। वे सतत् नाम जप को महत्त्व देते हैं: राम कहि बैठिये उठिये कहि के राम। चलिए हरि-हरि-हरि जपत मगनीराम प्रणाम।। () ईश्वर के जितने भी नाम हैं उनमें संत कवि द्वय को राम नाम अधिक प्रिय है। नाम स्मरण की महत्ता उनके काव्य में सर्वाधिक मिली है।
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Pages:29-31
How to cite this article:
शतदल मंजरी "संत कबीर और संत मगनीराम के राम में वैषम्य ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 29-31
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