ARCHIVES
VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
राधानाथ राय के काव्य में प्रणय चेतना
Authors
चिन्मयी मिश्र
Abstract
प्रेम सबसे बलवान होता है। प्रेम करनेवाले युवायों में इसका जबरदस्त असर दिखता है। यहाँ तक कि प्रेमियों का स्वभाव प्रेम के प्रभाव से आमूलचूल बदल जाता है। जो शर्मिले स्वभाव का है वह इस प्रकार का कार्य करता है जिसे देखकर लोग उसे निर्ल्लज ही कहेंगे। जो भयालू स्वभाव का है वह अकेले अँधेरी रात में अपने प्रियपात्र से मिलने के लिये बेफिकर निकल पडता है। अपने प्रेम को साकार करने के लिये सामाजिक आदव-कायदा] रीति-रिवाज, परम्परा को तोडना उनके लिये मामूली बात है। परिवार के बुजूगों की रोक-थाम उन्हें अखरता है और वे उनके सामने रोक-ठोक अशालिन मन्तव्य दे देते हैं। कोई अपने पिताजी के शत्रु से प्रेम करता है एवं उसे प्रतिष्ठित करने के लिये अपने पिताजी की आबरू को भू-लुण्ठित कर देता है। फिर कोई एक-तरफा प्रेम करके अपने प्यार को जबरदस्ती पाना चाहता है जिसका परिणाम किसी भी पक्ष के हित में नहीं जाता है। इन प्रेमियों की नजर के सामने केवल उनका प्रियपात्र होता है। न वे अपने परिवार की सोचते हैं, न अपने समाज की। इन प्रेमियों का जीवन एक-दूसरे पर अवलम्बित होता है। यद्यपि उनका एकनिष्ठ प्रेम सराहनीय है फिर भी इनका अपने समाज से दुर भाग जाने की रवैया चिंता का विषय है। यदि किसी कारण से उनका प्रेम असफल हो जाता है तो खुदकुशी करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता उन्हें नहीं सूझता है। इसके दो कारण हैं। पहला कारण है ये प्रेमी लोग भावातिरेक से बहनेवाले होते हैं। दुसरा कारण है चूंकि इन्होंने अपने समाज की अनदेखी की है, इनके दुर्द्दिन में समाज की हमदर्दी इनको नहीं मिल पाती है। ये सब कुछ प्रेम तथा प्रणय की ही देन है जो युवाओं के दिमाग में चढ कर इन सारे कुकृत्यों को अंजाम देने के लिये उकसाते हैं। राधानाथ राय के समय युवाओं का प्रेम एक समाजिक समस्या बन कर उभरा था जिसको सुधारने के लिये कवि ने काव्य का सहारा लिया है और परोक्ष रूप से उन प्रेमियों पर करारा व्यंग्य- विद्रुप कसा है।)
Download
Pages:85-90
How to cite this article:
चिन्मयी मिश्र "राधानाथ राय के काव्य में प्रणय चेतना ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 85-90
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

