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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 1 (2022)
स्वातंत्र्य समर में चित्तौड़गढ़ विषयक हिंदी साहित्य की भूमिका
Authors
विकास कुमार अग्रवाल
Abstract
यह शोध आलेख स्वातंत्र्य समर में चित्तौड़गढ़ विषयक हिंदी साहित्य की भूमिका पर केंद्रित है। लेखक ने चित्तौड़गढ़ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका को हिंदी साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है। चित्तौड़गढ़ को केवल एक दुर्ग नहीं, बल्कि त्याग, बलिदान, शौर्य और मातृभूमि प्रेम की सजीव प्रतीक भूमि बताया गया है, जहाँ वीर पुरुषों और वीरांगनाओं ने आज़ादी और सम्मान के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। शोध में विश्लेषण किया गया है कि बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था, तब हिंदी साहित्यकारों का ध्यान चित्तौड़गढ़ के ऐतिहासिक बलिदानों की ओर आकृष्ट हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर मैथिलीशरण गुप्त, श्याम नारायण पांडेय, हरिकृष्ण प्रेमी, रामकुमार वर्मा, गोविंद वल्लभ पंत और जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद जैसे साहित्यकारों ने चित्तौड़ की गौरवगाथा को अपने काव्य, नाटक और एकांकी के माध्यम से प्रस्तुत किया। लेख में गुप्त जी की भारत भारती और रंग में भंग, पांडेय जी के महाकाव्य जौहर और हल्दीघाटी, प्रेमी जी के नाटक राखीबंधन, वर्मा के दीपदान और पंत के राजमुकुट का विश्लेषण करते हुए यह बताया गया है कि चित्तौड़गढ़ की प्रेरणादायक गाथाएं स्वतंत्रता संग्राम में जनता को राष्ट्रीय चेतना, बलिदान और एकता के लिए प्रेरित करती रहीं। इस शोध का निष्कर्ष है कि हिंदी साहित्य में चित्तौड़गढ़ की स्वाधीनता परंपरा ने आजादी के आंदोलन को एक सांस्कृतिक, भावनात्मक और नैतिक आधार प्रदान किया, जिसने जनमानस में राष्ट्रीय भावना का संचार किया।
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Pages:61-65
How to cite this article:
विकास कुमार अग्रवाल "स्वातंत्र्य समर में चित्तौड़गढ़ विषयक हिंदी साहित्य की भूमिका". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 1, 2022, Pages 61-65
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