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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 1 (2022)
सेवा राम यात्री की कहानियों में यथार्थ चेतना
Authors
पवन कुमार साव
Abstract
हिंदी साहित्य जगत के प्रसिद्ध साहित्यकार ‘सेवा राम यात्री’ जी लगभग पांच दशकों से अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। यात्री जी एक प्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार और व्यंग्यकार है। इनकी कथादृष्टि व्यापक सामाजिक संदर्भ को लिए हुए है। जिसके केंद्र में आर्थिक रूप से कमजोर आम आदमी की जीवन गाथा मौजूद है। कथा दृष्टि के बिना कोई भी आधुनिक कहानी रची नहीं जा सकती या यूं कहा जाए कि आधुनिक कहानी बिना किसी कथादृष्टि के संभव नहीं है तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। सामान्य रूप से कथा दृष्टि का अर्थ कथा में निहित मूल विचार, दर्शन या कथा सृजन का विधान होता है। कहानी का सृजन वही कर पाता है जिसमें सृजनशील प्रतिभा होती हैद्य कविगुरु ‘रवीन्द्रनाथ’ के अनुसार “जब कोई बड़ी सृजनशील प्रतिभा समालोचना में हाथ डालती है, तब उसके लिए केवल यही संभव होता है कि वह समालोचना को ही सृजनात्मक कर्म बना दे।”1 ठीक इसी प्रकार कहानी के सृजन में भी कथाकार की सृजनात्मक प्रतिभा ही उसकी कथा दृष्टि को एक नवीन और व्यापक आयाम प्रदान करती है। किसी भी लेखन में रचनाकार के अनुभव की अभिव्यक्ति, मनोरंजन अथवा समाज को मानवीय और जिम्मेदार बनाने के लिए होता है। जिसमें कल्पना और यथार्थ दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर अपना एक विशेष महत्व रखते हैं परन्तु यथार्थ मानव जीवन की गहनता और जटिलता को समझने एवं जीवन में आने वाले व्यापक परिवर्तनों को उद्घाटित करने में ज्यादा कारगर होता है। ‘रामदरश मिश्र’ के अनुसार “एक रचनाकार का प्राथमिक दायित्व यथार्थ की पहचान को अभिव्यक्ति देना हैा यथार्थ का स्वरुप बड़ा ही संश्लिष्ट, जटिल और परिवर्तनशील होता है। उसे देखने के लिए जीवन का गहरा अध्ययन और व्यापक अनुभव अपेक्षित है ।”2 साहित्य में यथार्थ समय-समय पर परिवर्तित होते रहते हैं। जिसका स्तर आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक इत्यादि कुछ भी हो सकता हैद्य कथाकार समाज में निहित यथार्थ को अपनी सर्जनात्मक चेतना के आधार पर ग्रहण करता है और उसे एक कथा का रूप देता है। “साहित्य में इस परिवर्तनशील यथार्थ की पहचान दो स्तरों पर होती है। एक तो समकालीन जीवन में लक्षित होने वाले सम्बन्धों, प्रसंगों, समस्याओं, घटनाओं, हलचलों आदि की स्वीकृति के स्तर पर, दूसरे इन समस्त सम्बन्धों, प्रसंगों, समस्याओं, घटनाओं, हलचलों आदि के मूल में कार्य करने वाली केन्द्रवर्ती चेतना की समझ के स्तर पर वास्तव में असली यथार्थ-दृष्टि इस दूसरे रूप में ही दिखाई पड़ती है।”3 यात्री जी के रचनाओं में न केवल केंद्रवर्ती चेतना की पहचान है बल्कि यथार्थ को प्रस्तुत करने की अपनी देखने-समझने की अपनी एक दृष्टि भी है।
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Pages:45-48
How to cite this article:
पवन कुमार साव "सेवा राम यात्री की कहानियों में यथार्थ चेतना ". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 1, 2022, Pages 45-48
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