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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
आंचलिकता और ’पंचलाइट’
Authors
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता
Abstract
हिंदी साहित्य में आंचलिकता की शुरुआत फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाओं से होती है। आंचलिक साहित्य की पहचान के कई आधार हो सकते हैं, केवल गाँवों से कथावस्तु का जुड़ाव होना भर आंचलिकता की पहचान नहीं है। ऐसा इसलिए कि भारत मुख्यतः गांवों का देश है अतः इसे आंचलिक साहित्य का विभेदक पहचान नहीं माना जा सकता। रेणु की कहानियों का संसार अपनी संरचना एवं शिल्प में हिंदी कहानी परम्परा की एक नई पहचान लेकर उपस्थित होती है। इनकी कहानियाँ प्रेमचंद से जितनी भिन्न है उतनी ही उनके समकालीन कथाकारों से। रेणु की कहानियाँ गाँव एवं लोक की संस्कृति के वैभव को गहराई से छूती है। इनकी कहानियाँ किसी विचार या आदर्श को केंद्र में न रखते हुए सीधे हमें सामान्य जीवन में उतारती हैं। रेणु का ध्यान हमेशा से भारतीय ग्रामीण जीवन के बदलते हुए संश्लिष्ट यथार्थ की ओर उतना नहीं है था जितना उसके उत्सव धर्म स्वरूप की ओर । फणीश्वरनाथ रेणु ग्राम्यजीवन की आत्मीयता को अपने पूर्ण भाषायी परिवेशों के साथ उजागर करते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु की औपन्यासिक आंचलिक कला अत्यन्त उच्च कोटि की हैं। रेणु की कहानियां वास्तव में यथार्थ अनुभूति एवं संवेदनशीलता के उत्कृष्ट नमूने कहे जा सकते है जिनमें बिहार के अंचल विशेष का जीवन पूरी सच्चाई और गहराई के साथ उभारा गया है। ’पंचलाइट’ एक पूर्णतः आंचलिक कथा नहीं है। परंतु आंचलिकता इस कहानी के केंद्र में है जो पात्रों की भाषा पात्रों के नाम तथा परिवेश और वातावरण से पता चलता है। अतः कहा जा सकता है कि आंचलिकता की दृष्टि से ’पंचलाइट’ एक सफल कहानी है।
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Pages:79-81
How to cite this article:
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता "आंचलिकता और ’पंचलाइट’". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 79-81
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