Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
विधि विरूद्ध बालकों के मानवाधिकारों का संरक्षण तथा अपराध निरोध में रवीन्द्र नाथ टैगोर के शैक्षिक दर्शन की उपादेयता
Authors
कमल कान्त जोशी
Abstract
किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 2(13) के अनुसार विधि विरूद्ध बालकों से आशय वह बालक जिन्हांेने अपराध के दिन तक 18 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं की है और उन पर आरोप है कि उन्होंने कोई अपराध किया है या अपराध करने का आरोप उन पर लगा है। बच्चों के अपराध की ओर आकर्षित होने के कई कारण हो सकते है, मगर सामुदायिक व्यवस्था व परिवार का विघटन, असंगठित नगरीकरण व गरीबी इसके प्रमुख कारण हैं। बच्चों को अपराध से विमुक्त रखने में शिक्षा एक महत्वपूर्ण कारक है जिसके द्वारा विधि विरूद्ध बालकों को समाज की मुख्यधारा में आसानी से लाया जा सकता है। रवीन्द्र नाथ टैगोर जी के शैक्षिक दर्शन की बात करें तो वह मुख्यतः ऐसी शिक्षा चाहते थे जो बालक को प्रकृति के सुरम्य वातावरण में प्राप्त हो ताकि आगे चलकर वह श्रेष्ठ मानव बन सकें। टैगोर के शिक्षा दर्शन के मूल तत्व - शिक्षा में मूल्यों की उपादेयता, शिक्षा में मनोवैज्ञानिकता का समावेश, शिक्षा में सौन्दर्यानुभूति तथा शिक्षा में नैतिकता का समावेश के द्वारा क्रमशः विधि विरूद्ध बालकों को विचलन से दूर रखा जा सकता है, उनका समाज में समायोजन किया जा सकता है, मानसिक विकास तथा गिरोह अपराध से बच्चों को दूर रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त विधि विरूद्ध बालकों के मानवधिकारो के संरक्षण में टैगोर के शैक्षिक दर्शन के दो मूल तत्व शारीरिक विकास व संवेगात्मक विकास महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते है।
Download
Pages:1-5
How to cite this article:
कमल कान्त जोशी "विधि विरूद्ध बालकों के मानवाधिकारों का संरक्षण तथा अपराध निरोध में रवीन्द्र नाथ टैगोर के शैक्षिक दर्शन की उपादेयता". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 1-5
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.