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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
हिन्दी कथा-साहित्य के सर्जनात्मक प्रतिभा-श्री भैरवप्रसाद गुप्द
Authors
राजू सी. पी
Abstract
(हिन्दी साहित्य में अनेक नये-नये लेखक उभरकर सामने आये हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया है। उन उभरते हुए लेखकों में एक महत्वपूर्ण नाम है - भैरवप्रसाद गुप्त। उन्होंने प्रेमचन्द की यथार्थवादी परंपरा को, यशपाल के बाद समकालीन सन्दर्भों में आगे बढ़ाने का अतुल्य प्रयास किया है। सन् 1943 में प्रकाशित ‘कसौटी’ एकांकी संग्रह के प्रकाशन से लेकर उनके मरणोपरान्त सन् 1997 में प्रकाशित महत्वपूर्ण उपन्यास ‘छोटी सी शुरुआत तक’, पचास सालों से भी अधिक की अवधि में उन्होंने प्रेमचन्द की तरह देश की शहरी और ग्राम जीवन के बहुविध और जटिल हुए यथार्थ का विश्वसनीय चित्र प्रस्तुत किए हैं। अपने समय की जटिलताओं को पहचानकर, बहुलता का साहित्य समकालीन संदर्भ में लिखने का जो साहस उनमें दिखाई पड़ता है वह सराहनीय हैं। गुप्तजी हिन्दी साहित्य के एक बहुमुखी प्रतिभावान कलाकार हैं। बहुमुखी प्रतिभा इसलिए कहा जाता है कि वे हिन्दी साहित्य के पद्य विधा को छोड़कर प्रायरू सभी गद्य विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। हिन्दी साहित्य जगत के अमर साहित्यकार श्री भैरवप्रसाद गुप्त, हिन्दी साहित्य के ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य की असाधारण सर्जानात्मक प्रतिभा के प्रतीक हैं।)
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Pages:54-56
How to cite this article:
राजू सी. पी "हिन्दी कथा-साहित्य के सर्जनात्मक प्रतिभा-श्री भैरवप्रसाद गुप्द". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 54-56
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