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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 3 (2022)
जैव विविधता (संशोधन) अधिनियम 2021ः एक समीक्षात्मक अध्ययन
Authors
सुभाष भिमराव दोंदे
Abstract
1992 के जैव विविधता सम्मेलन के तहत अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को ध्यान में रखते हुए, भारत में जैव विविधता अधिनियम-2002 अधिनियमित किया गया; जो जैव विविधता के संरक्षण, इसके संधारणीय उपयोग और जैविक संसाधनों तथा तत्सम्बन्धी पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों के उचित या निष्पक्ष और न्यायसंगत बंटवारे को सुनिश्चित करने के उद्देश्यों पर बनाया गया था। भारतीय चिकित्सा व्यवसायियों, बीज क्षेत्र, उद्योग और शोधकर्ताओं पर भारी अनुपालन बोझ लादकर इस अधिनियम ने सहयोगपूर्ण अनुसंधान और विदेशी निवेश को दुष्कर बना दिया था। किन्तु दो दशक उपरांत अधिनियम के प्रस्तावित संशोधन ने भारत के जैविक संसाधनों का उपयोग करने के लिए आवश्यक अनुसंधान और पेटेंट आवेदन प्रक्रियाओं में अधिक विदेशी निवेश को शीघ्रपथ करने निर्बन्धों को शिथिल किया है। इसके अलावा यह अधिनियम पंजीकृत आयुष चिकित्सकों और संहिताबद्ध पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करने वाले लोगों को जैविक संसाधनों तक पहुँचने के लिए संबधित निकायों को पूर्व सूचना देने से छूट देने का प्रावधान रखता है। 2002 के पूर्ववर्ती अधिनियम के तहत, पर्यावरण तथा संबंधित अधिकारों के खिलाफ सभी उल्लंघनों को आपराधिक (क्रिमिनल) माना जाता था; किन्तु संशोधित अधिनियम में ऐसे उल्लंघनों को केवल नागरिक (सिव्हिल) अपराधों में बदल देने का प्रस्ताव रखा है। संशोधित विधेयक जैव विविधता के संरक्षण और समुदायों के अधिकारों की मान्यता के बारे में कम लगता है; जो इस जैव विविधता के संरक्षक हैं और जो अधिनियम का प्राथमिक उद्देश्य है। वर्तमान स्वरूप में विधेयक 'जैव-डकैती' का मार्ग प्रशस्त करेगा और इस प्रकार उस मूल उद्देश्य को ही विफल कर दिया जाएगा जिसके लिए अधिनियम को पहली जगह में बनाया गया था। संक्षिप्त में ऐसा प्रतीत होता है की प्रस्तावित संशोधन यह जैव विविधता के परिरक्षण के बजाय व्यापारीकरण या वाणिज्यीकरण एवं दोहन तथा स्थानिक समुदायों के शोषण को बढ़ावा देगा। इस पृष्ठभूमि में प्रस्तुत अनुसंधान लेख जैव विविधता संबंधी - पूर्ववर्ती तथा संशोधित अधिनियम के कुछ पहलुओं का समीक्षात्मक अध्ययन है।
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Pages:14-18
How to cite this article:
सुभाष भिमराव दोंदे "जैव विविधता (संशोधन) अधिनियम 2021ः एक समीक्षात्मक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 3, 2022, Pages 14-18
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