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VOL. 8, ISSUE 5 (2022)
समकालीन हिंदी विमर्शवादी साहित्य और स्त्री भाषा
Authors
लक्ष्मी जोशी
Abstract
स्त्री भाषा बिना किसी लागलपेट के अपने विचार और भाव अभिव्यक्त करने में सक्षम देखी गयी है। भाषा में वाक्य गठन हो या शब्द चयन कहीं भी स्त्री चुकी नहीं है उसने बडी़ सजकता और बौद्धिकता से भाषा का प्रयोग किया है। स्त्री भाषा कहीं पर सरल और सामान्य दिखती है तो कहीं पर इतनी जटिल और बौद्धिक है कि सामान्य पढा़ लिखा व्यक्ति उसके भाव तक को समझ नही पाता । कहने का तात्पर्य स्त्री भाषा में जटिलता और सरलता दोनों का समन्वय पाया जा सकता है यदि हम स्त्री विमर्शवादी आलोचकों या समालोचकों की भाषा का अध्ययन करे तो भाषा में जटिलता और क्लिष्टता दिखाई पड़ेगी । आलोचना और विमर्श के लिए विचारधारा, आशय निरुपण और सैद्धांतिक की आवश्यता पड़ती है, इसलिए ऐसी रचनाओं में स्वतः भाषा में क्लिष्टिता आ जाती है । आलोचना और विमर्श ऐसी रचनाएं है जिसमें कल्पना से ज्यादा विचार विमर्श और तथ्यों की आवश्यता होती है।
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Pages:23-26
How to cite this article:
लक्ष्मी जोशी "समकालीन हिंदी विमर्शवादी साहित्य और स्त्री भाषा". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 5, 2022, Pages 23-26
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