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VOL. 8, ISSUE 5 (2022)
आदिवासी विमर्श एवं समकालीन हिंदी कविता
Authors
भावना
Abstract
वर्तमान समय में विमर्शों का जो दौर चल रहा है, उसमें आदिवासी विमर्श की गूंज भी बहुत जोरों-शोरों से सुनाई दे रही है। सामान्यतः आदिवासी से तात्पर्य आदिम युग में रहने वाली उन जातियों से है, जो लगभग 5000 वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता को संजोए हुए हैं। इन आदिवासियों की औपनिवेशिक युग से पूर्व अपनी एक स्वतंत्र सत्ता थी। प्रकृति के संसाधनों एवं जल, जंगल व जमीन पर इनका पूर्ण अधिकार था। औपनिवेशिक सत्ताएं जैसे-जैसे सुदृढ़ होती गयी वैसे ही इन आदिवासियों पर संकटों के पहाड़ टूटते चले गये। जल, जंगल और जमीन से इन्हें दूर करके इनके अधिकारों का हनन किया जाने लगा। पूँजीवादी ताकतों के प्रतिरोध एवं अपने निज व अस्मिता की तलाश में आज समकालीन हिंदी कविताओं में हमारे समक्ष जो आदिवासी विमर्श उभर कर आ रहा है वह इन्हीं सताये हुए लोगों की आवाज है। समकालीन हिंदी कविता में यह विमर्श अपनी प्रमाणिकता, यथार्थता, सशक्त एवं जीवंत अनुभूतियों के कारण एक महत्वपूर्ण विमर्श के रूप में सामने आ रहा है। इन आदिवासियों के जीवन का मूल उद्देश्य प्रकृति का संरक्षण रहा है।
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Pages:40-42
How to cite this article:
भावना "आदिवासी विमर्श एवं समकालीन हिंदी कविता". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 5, 2022, Pages 40-42
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