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VOL. 8, ISSUE 5 (2022)
नर के भीतर के नारायण को बचाती कृतिः गाथा कुरुक्षेत्र की
Authors
सुनीता मिश्रा
Abstract
आज के उत्तर आधुनिक युग में पाश्चात्य संस्कृति, सभ्यता हमपर इस तरह हावी हो गई है कि हम अपनी पहचान को, अपनी संस्कृति को भूलकर महत्त्वाकांक्षाओं के वन में स्वार्थ से लिप्त होकर ऐसे भटक रहे हैं कि मानव जीवन का कुछ ओर-छोर ही दिखाई नहीं देता है। आज का युवक आकाश की ऊंचाइयों को तो छूना चाहता है पर ना तो वह धर्म व कर्म की सच्ची राह से भटक गया है। वह किसी भी तरह से विजय हासिल करना चाहता है, अपना लक्ष्य साधना चाहता है फिर उसे अनैतिकता की राह से ही क्यों ना गुजरना पड़े, उसमें भी वह संकोच नहीं करता है। आज का युवक अपनी आत्मा की सच्ची आवाज नहीं सुनता वह तो केवल कुलांचे भरता किसी की परवाह किए बिना, सबको धकियाते-छकियाते तेजी से आगे बढ़ना चाहता। उसके अंदर की सम्वेदनाएं मर चुकी हैं। आज की बाजारवादी प्रवृति ने उसे उपभोक्तावादी बना दिया है फिर चाहे अपनत्व के रिश्ते ही क्यों ना हो। उसकी आत्मा में बसे नारायण ने जैसे दम तोड़ दिया है। महाभारत गीता ऐसे से भटके युवकों के लिए वरदान है जिसे समय-समय अनेक विद्वानों ने अनुवादित करके समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया है औरमनोहर श्याम जोशी ने अपनी कृति श्गाथा कुरुक्षेत्र कीश् में अत्यंत सहज-सरल रूप में इसे प्रस्तुत किया है और उसके माध्यम से आज के नर के भीतर मरते नारायण को बचाने का प्रयास किया है। इस कृति के आरम्भ में एक प्रकार सेवेदव्यास यह कहकर सचेत करते हैं कि ’’जहां सत्य,धर्म, ईमानदारी, विनय और शर्म है वहीं कृष्ण हैं और जहां कृष्ण हैं वहीं विजय है।’’ और अंत में सन्देश देते हुए यह भी कहते हैं कि ’’धर्म से मोक्ष ही नहीं धर्म और काम भी सिद्ध होते हैं।ष् इसलिए धर्म की राह पर चलकर कर्म करें परिणाम की चिता किये बिना तो इंसानियत जिंदा रहेगी और जब मानवीयता जीवित रहेगी तो हर नर के भीतर बैठे नारायण भी जीवित रहेंगे। मनोहर श्याम जोशी की कृति श्गाथा कुरुक्षेत्र कीश् यही कहना चाहते हैं कि नर के भीतर का नारायण जिंदा रहेगा तो नर भी जिंदा रहेगा। आज इसकी ही आवश्यकता है वरना मानीयता के पतन के साथ -साथ मानव सभ्यता भी खत्म हो जाएगी।
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Pages:64-66
How to cite this article:
सुनीता मिश्रा "नर के भीतर के नारायण को बचाती कृतिः गाथा कुरुक्षेत्र की". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 5, 2022, Pages 64-66
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