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VOL. 9, ISSUE 1 (2023)
रेखाएँ पाप-पुण्य कीः एक जीवन सत्य
Authors
डॉ. राजेन्द्र सिंह
Abstract
प्रस्तुत काव्य संग्रह जीवनगत सत्य का उदघाटन ही नहीं करता अपितु जीवन मूल्यों का साक्षात्कार भी करवाता है। यह न केवल व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा को जगाता है अपितु जीवन को प्रगति की ओर भी अग्रसर करता है। कवि समकालीन परिवेषगत विषमताओं और विसंगतियां के प्रति भी आकुल-व्याकुल दिखाई देता है ताकि सामाजिक ताना-बाना सुरक्षित एवं संरक्षित बना रहे। केवल यही नहीं कवि सामाजिक, राजनीतिक अव्यवस्था को दूर करके व्यवस्था स्थापित करने का पक्षधर है फिर चाहे इसके लिए उसे किसी से टकराना ही क्यों न पड़े इसलिए कभी वह सामाजिक हर्षोंल्लास की अभिव्यक्ति करता है तो कभी दुःख-दर्द की। इस प्रकार निर्दाेष जी जातीयता और साम्प्रदायिक भावना का त्याग करने की बात भी करते हैं, साथ ही समाज में प्रेम और सौहार्द की प्रतिस्थापना की वकालत भी करते हैं तथा अधर्म और पापाचार को त्यागकर धर्म की संस्थापना और पुण्य एवं परोपकार पर बल देते हैं।
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Pages:55-58
How to cite this article:
डॉ. राजेन्द्र सिंह "रेखाएँ पाप-पुण्य कीः एक जीवन सत्य". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 1, 2023, Pages 55-58
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