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VOL. 9, ISSUE 1 (2023)
बहुविषय के ज्ञाता-अज्ञेय (अरे यायावर रहेगा याद रचना के संदर्भ में)
Authors
डॉ. सविता अजित सिंग, कांबळे रेश्मा मारूती
Abstract
’अरे यायावर रहेगा याद’ (1953) यह रचना जिसमें ’अज्ञेय’ की भारतीय यात्राओं का विशद चित्रण है। इस रचना में भौगोलिक सूचनाओं के अतिरिक्त संस्कृति, सभ्यता, दर्शन एवं इतिहास की विस्तृत जानकारी मिलती है। यह रचना अपने काल के भीतर और बाहर झाँकते हुए सांस्कृतिक विमर्श को प्रस्तुत करती है। इस रचना में यात्रा तथा संस्मरण का पंचमेल है। अनजानों व्यक्तियों, स्थलों, और दृश्यों के संस्मरण, विवरण बड़े मनोहारी बन पड़े है। इस कारण इसमें एक ओर नए वातावरण का वर्णन है तो दूसरी ओर प्राचीन इतिहास का उद्घाटन किया गया है। रचना में लेखक ने मानव जीवन की संपूर्णता को रूपायित किया है। सार रूप में कहा जाये तो अज्ञेय का यह यात्रा विवरण साहित्य-संस्कृति, जीवनशैली, विचार इत्यादि भावबोध का पूरा पूँज है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अज्ञेय का यात्रा-साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। साहित्य के सभी विधाओं में नवीनता का प्रयोग करनेवाले लेखक के रूप में अज्ञेय की पहचान है। अज्ञेय का पूरा नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन है। पिता का नाम हीरानंद शास्त्री, एम. ए. पीएच. डी. पुरातत्व विभाग में कार्यरत थे तथा कर्तारपुर पंजाब के निवासी थे। वे कसिया गोरखपुर में जब खुदाई का काम कर रहे थे, तब वहीं 7 मार्च 1911 ई. को अज्ञेयजी का जन्म हुआ था। अज्ञेयजी अपने पिताजी के साथ अनेक प्रांतों में रह चुके थे, अनेक प्रांतों में रह चुके थे, अनेक प्रांतों में उन्होंने यात्राएँ की थीं वहाँ के स्कुलों में भी पढ़ चुके थे। अज्ञेय की पहचान हमारे सामने एक कवि, उपन्यासकार, कहानी-लेखक, आलोचक, निबंध लेखक, गद्यगीत लेखक, पत्रकार, यात्रा-साहित्य लेखक एवं उच्चकोटि के मनोविश्लेषक के रूप में आते है। हिंदी मासिक पत्रिका ‘विशाल भारत’ के भूतपूर्व संपादक भी आप रह चुके हैं। साथ ही ‘सैनिक’ प्रतीक जैसे पत्रों का संपादन भी आपने किया है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य के सभी क्षेत्रों में रचनाएँ की है। उपन्यास तथा काव्य में विशेषकर योगदान दिया है। हिंदी साहित्य को बहुत सी कृतियाँ अज्ञेय ने दी है। इनकी रचनाओं में भावात्मकता से अधिक संकेतात्मकता और बौद्धिकता अधिक रहती है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य को विशेषकर गद्य को बौद्धिक सूक्ष्मता प्रदान की है। हिंदी यात्रा-साहित्य पर इनका एक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अरे यायावर रहेगा याद’ नाम से है। 228 पृष्ठों का यह ग्रंथ सन् 1953 ई. में सरस्वती प्रेस, वाराणसी से प्रकाशित हुआ था। इस ग्रंथ के संदर्भ में डॉ. सुरेंद्र माथुर अपना मंतव्य प्रकट करते हुए कहते है, ‘‘इसमें अज्ञेयजी ने अपने जीवन को यायावर का चिरंतन पथ स्वीकार किया है। अपनी विभिन्न यात्राओं को रेखाचित्र, स्केच और अलंकृतियों का रूप देकर प्रस्तुत किया है।’’1 अज्ञेय यात्रा को जीवन में महत्त्वपूर्ण मानते हैद्य यात्रा को जीवन का पर्याय मानते है। ‘अरे यायावर रहेगा याद’ रचना में लेखक ने यात्रा के पड़ाव का विस्तारपूर्वक, स्थूल, व्यापक वर्णन तो किया ही है- साथ ही उसके अंतर्मन के सूक्ष्मता का भी वर्णन किया है। यह रचना इस द़ृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। यात्रा को जीवन का पर्याय मानते हुए अज्ञेय यात्रा को जीवन की अमूल्य निधि मानते है। यात्री जीवन का परिचय प्रतीकात्मक रूप में अपने शब्दों में इस प्रकार दिया है, ‘‘चल चल देता है लाद-लाद कर बार-बार बनजारा सब ठाठ धरा रह जाता, धन बस दूर क्षितिज का तारा! यायावर को भटकते चालीस बरस हो चले, किंतु इस बीच न तो वह अपने पैरों तले घास (या मॉस) जमने दे सका है, ‘न कुछ ठाठ जमा सका है, न क्षितिज को कुछ निकट ला सके है- उसके तारे को छूने की तो बात ही क्या! कितने स्थल उसने देखे जहाँ बैठकर ॠषियों ने देहों पर वाल्मीक उगा लिये, जहाँ मुनि तपस्या करते-करते पाषाण हो गए, जहाँ देवता जम कर पर्वत श्रृंग बन गए, जहाँ मानवों ने ऐहिक कांक्षाओं-वासानाओं से मुक्ति पाई किंतु यायावर ने समझा है कि देवता भी जहाँ मंदिर में रूके कि शिला हो गए और प्राण संचार के लिए पहली शर्त है गति, गति, गति।’’2 ‘अज्ञेय’ ने अपनी इस रचना में ‘अरे यायावर रहेगा याद’ में प्रकृति, इतिहास, धर्म, पुराण, संस्कृति, पुरातत्व, देशप्रेम वैज्ञानिक शोधात्मक द़ृष्टिकोण का परिचय दिया है। इन विविध विषय के के प्रति उनके द़ृष्टिकोण एवं गहन अध्ययन को मद्दों के आधार पर विवेचन कर सकते है.
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Pages:28-30
How to cite this article:
डॉ. सविता अजित सिंग, कांबळे रेश्मा मारूती "बहुविषय के ज्ञाता-अज्ञेय (अरे यायावर रहेगा याद रचना के संदर्भ में)". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 1, 2023, Pages 28-30
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