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VOL. 9, ISSUE 3 (2023)
त्रिलोचन शास्त्री-कबीर, तुलसी और गा़लिब की परंपरा के कवि
Authors
डॉ. रम्या पी. आर
Abstract
कवि त्रिलोचन शास्त्री हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख हस्ताक्षर है। उनका जन्म उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कटघरा चिरानी पट्टी में सन् 1917 को हुआ था। उनका मूल नाम वासुदेव सिंह था। उह्नोंने काशी हिन्दु विश्वविद्यालय से एम.ए. अंग्रेज़ी में की, संस्कृत में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की थी। हिन्दी के अतिरिक्त अरबी और फारसी भाषाओं के निष्णात ज्ञाता रहे थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वे खास सक्रिय रहे। प्रभाकर, बानर, हँस, आज, समाज जैसी पत्र दृ पत्रिकाओं का संपादन किया। त्रिलोचन शास्त्री 1995 से 2001 तक जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। वाराणसी में ज्ञानमंडल प्रकाशन संस्था में भी काम करते रहे। हिन्दी व ऊर्दु के कई शब्द कोषों की योजना से भी जुडे रहे। उह्नें हिन्दी सौनेट जनक और साधक माना जाता है। उनके 17 काव्य सग्रह प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त कहानी, गीत, गज़ल और आलोचना से भी उह्नोंने हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया।
प्रकाशित काव्य संग्रह
धरती
गुलाब और बुलबुल
दिगंत
ताप के ताए हुए दिन
शब्द
उस जनपद का कवि हूँ
अरधान
तुम्हें सौंपता हूँ
मेरा घर
चौती
अनकहनी भी कुछ कहनी है
जीने की कला
त्रिलोचन शास्त्री हिन्दी के प्रयोगधर्मी कवि रहे थे। उन्होंने भाषा शैली और विषयवस्तु में अपनी अलग छाप छोडी। उनका कवि व्यक्तित्व किसीकी परवाह नहीं की। उनकी मुख्य चिन्ता हिन्दी के जागरूक पाठक और कवि के मध्य सीधे संबंध की रही है। देश के भिन्न इलाके में जागरूक पाठकों का सीधा संबंध त्रिलोचन के कवि से रहा है। अशोक वाजपेयी के अनुसार त्रिलोचन हिन्दी कवियों के समाज में स्वाभिमान की एक बहुत शवीह थें।
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Pages:6-8
How to cite this article:
डॉ. रम्या पी. आर "त्रिलोचन शास्त्री-कबीर, तुलसी और गा़लिब की परंपरा के कवि". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 3, 2023, Pages 6-8
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