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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
‘सीमन्तनी उपदेश’ में स्त्री अस्मिता और अस्तित्व
Authors
गुँजा आनंद
Abstract
‘सीमन्तनी उपदेश’ कृति ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत’ द्वारा रचित है। जिसका प्रकाशन सन् 1882 ई. में हुआ था। लगभग 106 वर्ष बाद इस पुस्तक की खोज कर डॉ. धर्मवीर ने अपने संपादन में सन् 1988 ई. में पुनः प्रकाशित किया। आज से लगभग 141 वर्ष पूर्व लेखिका ने नारियों की समस्या पर बहुत ही गंभीरता से सोचा था। यह पुस्तक भारत में स्त्री जागरण का एक महान ग्रंथ है। इसे पढ़ने के उपरांत पाठकगण को यह महसूस होगा कि भारत के संदर्भ में इस विषय पर इतनी पुरानी पुस्तक मिलना नारी अधिकार के लिए एक त्यौहार की सी बात है। सीमन्तनी उपदेश स्त्री-अस्मिता और अस्तित्व से जुड़े सवालों का क्रांतिकारी दस्तावेज कहा जा सकता है। इससे पहले इतना निर्भीक लेखन साहित्य में कहीं नहीं मिलता, जहां एक ओर अज्ञात लेखिका ने कटु शब्दों में तत्कालीन समाज की स्त्री का यथार्थ वर्णित किया है वहीं दूसरी ओर स्वयं को अज्ञात रखकर तत्कालीन सामाजिक परिवेश की स्त्रियों की स्थिति का भी चित्रांकन किया है।सीमन्तनी उपदेश में लेखिका ने समस्त स्त्री जाति को उसे अपनी स्थिति के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया है। स्त्री अस्मिता व अस्तित्व जैसे प्रश्न पर लेखिका द्वारा उठाए गए स्त्री सरोकार हमारा खास रूप से ध्यान खींचते हैं। सीमन्तनी उपदेश में लेखिका ने विशेषकर विधवा स्त्री के जीवन की तकलीफों एवं पीड़ाओं का विवरण जिस रूप में प्रस्तुत किया है, उससे यह भली-भांति रूप से पता चलता है कि तत्कालीन समाज में स्त्री का विधवा होना एक अभिशाप के समान ही था। इस प्रकार इस पुस्तक में लेखिका ने स्त्री अस्मिता व अस्तित्व से जुड़े सभी सवालों को अपने विद्रोही स्वर में रेखांकित किया है। तत्कालीन समाज में स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व को महत्व ही नहीं दिया जाता था। इस अज्ञात लेखिका ने स्त्री संबंधी सरोकारों का विवरण प्रस्तुत कर स्त्री संबंधी सभी सवालों को बड़ी ही गंभीरता से उकेरने का सक्षम प्रयास किया है।
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Pages:42-45
How to cite this article:
गुँजा आनंद "‘सीमन्तनी उपदेश’ में स्त्री अस्मिता और अस्तित्व". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 42-45
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