ARCHIVES
VOL. 9, ISSUE 5 (2023)
बदलते परिपेक्ष में रूढ़िवादी अवधारणा को तोड़ती स्त्री
Authors
पवन कुमार शर्मा
Abstract
दूधनाथ सिंह बहुमुखी प्रतिभासंपन्न रचनाकार है वे हिन्दी कथा साहित्य के रचनाकारों का लेखन एवं रचनात्मक कर्म साठोत्तरी कहानी से जनवादी कहानी तथा समकालीन कहानी तक व्याप्त रहा है, उनमें से एक दूधनाथ सिंह जी भी हैं जो साठोत्तरी कहानी को ऊंचाई के शिखर तक लेकर जाते हैं। उन्होंने कथा जगत में प्रवेश तो अकहानी से किया था, जिसका आधार सेक्सजनित कुंठा, आशा-निराशा, घुटन, टूटन तथा टकरावों को व्यक्त किया है। मगर जल्दी ही उनका लेखन समाज के वंचित तबके के दुख दर्द से जुड़ गया और उन्होंने अनेकानेक कहानियाँ नारी के केंद्र में रख कर रचीं। दूधनाथ जी ने सन् 1960 के आसपास कहानी लिखना आरम्भ किया था, किन्तु ’रक्तपात’ कहानी के बाद वे चर्चित लेखक बन गये और निरन्तर अपने सजग, मुखर, निर्भीक, बेबाक लेखन की वजह से कहानी जगत में चर्चा में रहे। अपने जीवन का अधिकांष समय उन्होंने इलाहाबाद में व्यतीत किया, कहानियों के स्त्री पात्रों के सृजन में वे इसके इर्द-गिर्द रहे। दूधनाथ सिंह मध्यवर्ग के रचनाकार ही नहीं, सदस्य भी थे, उनके लिये जिन्दगी; एक दुःस्वप्न के समान है, जहाँ निरास भटकाव,अंधेरापन, निरुद्देष्य की भाव भी देखने मे आता है। इसी मानसिकता की अभिव्यक्ति उनकी कहानियों में हुई है। उनकी कहानियों को दो भागों में बाँटा जा सकता है- एक तरफ मध्यवर्गीय निराषा, विवषता और बेचौनी है, जो अभिधा षैली में व्यक्त किया गया है। दूसरे में उसी कथ्य को प्रतीक, फन्तासी, स्वप्नकथा की प्रविधि से चित्रित किया है। दूधनाथ सिंह समकालीन विमर्षाे पर यथा स्त्री एवं दलित पर भी अपनी स्पष्ट राय रखते हैं, तथा अपने स्त्री पात्रों का सृजन अत्यन्त सषक्त ढंग से समसामयिक परिवेष में किया है। स्त्री के विविध रूपों के साथ परिवार एवं समाज में उसकी नियति, स्थिति एवं षोषण की प्रक्रिया को, वे अपनी कहानियों में प्रस्तुत करते हैं। दूधनाथ सिंह की मान्यता है कि “आज का रचनाकार अपनी परिस्थितियों के प्रति प्रतिबद्ध है और उन्हें सच्चाई के साथ प्रकट करना चाहता है। इस लेखकीय ईमानदारी के फलस्वरूप ही वह नये-नये माध्यमों की तलाष करता है, ताकि वह अपने परिवेष के दबाव एवं विवषताओं को सही ढंग से मुखरित कर सके। वह स्वयं सभी परिस्थितियों में भागीदार है तथा राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विघटन से उत्पन्न संकटों को झेलता है। ये स्थितियाँ वस्तुतः सृजनात्मक क्षणों को प्रेरित करती है। जीवन परिस्थितियों के इस स्वीकार की भावना के परिणाम स्वरूप ही वे आज के जीवन की मान्यताओं विकृतियों और विषम परिस्थितियों की कठोरताओं का चित्रण करते हैं। वे मानते हैं। कि सारे संसार के निर्णयों का जितना गहरा दबाव आज हम पर है, उतना गहरा दबाव पहले किसी भी षताब्दी में नहीं था।’’ दूधनाथ जी ने आधुनिक परिवर्तन को अपने देष, अपनी सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों से संबद्ध करके देखा है।
Download
Pages:1-5
How to cite this article:
पवन कुमार शर्मा "बदलते परिपेक्ष में रूढ़िवादी अवधारणा को तोड़ती स्त्री". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 5, 2023, Pages 1-5
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

