Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 10, ISSUE 2 (2024)
भक्तिकालीन काव्य के उदय की परिस्थितियाँ
Authors
तबस्सुम खान, रामअवध यादव
Abstract
चौदहवीं सदी के अन्त तक हिन्दी साहित्य की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। रासो काव्य नाथ पंथी साहित्य, महाराष्ट्र में उदय होती हुई निर्गुण भक्तिधारा अमीर खुसरों का लोक मनोरंजनकारी साहित्य तथा विद्यापति की शृंगारिक धारा उत्तर भारत के अनेक प्रदेशों में हिन्दी भाषा के माध्यम से साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण कर चुकी थी। आदिकाल की वीरता और शृंगार से परिपूर्ण साहित्य से एकदम भिन्न इस काल के साहित्य में भक्ति की शान्त निर्झणी बहती है। कोई भी साहित्यिक प्रवृत्ति यूं ही अचानक विकसित नहीं होती, उसके पीछे कई सारे प्रमुख कारण कई शक्तियाँ और तमाम परिस्थितियाँ सक्रिय रहती हैं। साहित्य भी इनसे अवश्य प्रभावित होता है और कालान्तर में एक नया स्वरूप ग्रहण करता है। लगभग 300 वषों के भक्ति साहित्य का सृजन कोई सहज, सरल घटना नहीं थी। तत्कालीन इतिहास और समाज पर नजर डाले तो स्पष्ट होता है कि इसके पीछे कोई एक नहीं अनेक परिस्थितियाँ सक्रिय थीं। संक्षेप में देखें तो भक्तिकाल के काव्य के उदय में निम्नांकित शक्तियाँ सामने आती हैं। भक्तिकाल का काव्य सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। एक तरफ परम्परावादी साहित्यिक लोग अपनी परम्पराओं को बनाये रखने के पक्ष में थे। वीरगाथाकाल के अधिकांश कवि राजाश्रित थे और अपने-अपने महाराजाओं की प्रशंसा में काव्य रचना किया करते थे। यह कवि अक्सर अपने राजाओं का उत्साहवर्धन युद्ध के दौरान काव्य के माध्यम से करते थे। कुछ परम्परावादी लोग अपनी परम्पराओं को बनाये रखने के पक्ष में थे तो दूसरी ओर नव इस्लाम के हितैशी लोग स्वयं को प्रगतिशील बताकर समाज में बदलाव लाना चाहते थे। तत्कालीन कवियों की साहित्य सर्जना उक्त परिस्थितियों से प्रभावित थी और उनकी रचनाओं में यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भक्ति आंदोंलन के फलस्वरूप एक नया जीवन दर्शन विकसित हुआ, अभिनव वेदान्त का समुदय हुआ, जिसका तत्व दर्शन, धर्म दर्शन, आकार दर्शन और सामाजिक दर्शन प्राचीन वेदांग से भिन्न और युगीन सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल था। इस साहित्य में स्वीकृत सामाजिक मूल्यों के स्वीकार के बदले युवन के अनुभवों, नैतिक मूल्यों को विकसित करने का प्रयास दिखाई पड़ता है। निर्गुण भक्त कवि शास्त्र से अधिक अनुभव को महत्व देते थे क्योंकि शास्त्र से सत्य का साक्षात्कार संभव नहीं था। यहां प्रश्न यह उठता है कि नये भक्तिकालीन काव्य का धार्मिक, सांस्कृतिक आंदोलन दक्षिण भारत में ही क्यों हुआ।
Download
Pages:17-19
How to cite this article:
तबस्सुम खान, रामअवध यादव "भक्तिकालीन काव्य के उदय की परिस्थितियाँ". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 2, 2024, Pages 17-19
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.