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VOL. 10, ISSUE 4 (2024)
ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य उपन्यास ‘पागलखाना’ में बाज़ारवाद की सम्प्रभुता का विश्लेषण व प्रभाव
Authors
जानकी
Abstract
आधुनिक युग को बाज़ार का युग कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए। वैश्वीकरण के इस दौर में दिन-प्रतिदिन बढ़ते औद्योगीकरण, व्यवसायीकरण, प्रतियोगिता के कारण बाज़ार का हमारे समाज में विशेष स्थान हो गया है। बाज़ार ने हमारी सोच-विचार, गतिविधियों, पसंद, आदि को काफी हद तक प्रभावित किया है। नतीजतन, अपने प्रयोग की आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की खरीदारी के साथ हम विलसिता की महंगी वस्तुओं को भी जाने-अनजाने अपने जीवन में शामिल करने में लगे हुए है। बाज़ार की ताकते, जीवन की बदलती प्राथमिकताओं और स्थितियों के बीच अपना वर्चस्व स्थापित करना जानती है। सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि इसमें विशेष भूमिका निभा रहें है। टी.वी, ओ.टी.टी, यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों,विज्ञापनों जिनमे वर्जनाओं और पारंपरिक मूल्यों से मुक्त चमक-धमक भरी पाश्चात्य शैली की जीवनशैली दिखाई जाती है और उसी जिंदगी को हम लोग वास्तविकता में अपने जीवन में उतारना चाहते है। आज संतोष ओर संयम पर आधारित मूल्य खंडित हो रहे है और इनके स्थान पर भोगवाद और बाजारवाद प्रबल हो रहा है। युवा वर्ग में आक्रोश, आक्रामकता, असंतोष, हिंसक प्रवृतियां बढ़ रही है। व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने इसी बाजारवाद के यथार्थ रूप को अपने व्यंग्य के द्वारा हमारे सामने रखा है। लेखक अपने उपन्यास ‘पागलखाना’ में समाज में पूंजीवाद, बाज़ारवाद और सरकार के बीच संबंध को व्यंग्य के माध्यम से एक पागलों की दुनिया के जरिए समझाने का प्रयास करते हैं। ज्ञान चतुर्वेदी अक्सर अपने उपन्यासों में समाज के असल चेहरे को व्यंग्य के माध्यम से दिखाते हैं लेकिन पागलखाना द्वारा वह उससे एक कदम आगे जाते हुए पाठक को सच्चाई से अवगत कराने की कोशिश करते हैं।
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Pages:13-15
How to cite this article:
जानकी "ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य उपन्यास ‘पागलखाना’ में बाज़ारवाद की सम्प्रभुता का विश्लेषण व प्रभाव". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 4, 2024, Pages 13-15
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