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VOL. 10, ISSUE 4 (2024)
भारतीय ज्ञान परम्परा और हिंदी साहित्य
Authors
डॉ ममता गोयल, कुमारी आरती
Abstract
भारतीय ज्ञान परंपरा निर्मल, निश्चल एवं पवित्र स्रोत वाहिनी की तरह से वैदिक युग से चली आती है। प्रत्येक संस्कृति की धरोहर वहां के प्राचीन ग्रंथों में निहित है। भारतीय परम्परा में संपूर्ण वाङ्मय में देखा जाए तो “शास्त्र (विज्ञान, दर्शन, इतिहास आदि), काव्य (शास्त्रों से इतर) यदि शास्त्र और काव्य में अन्तर किया जाए तो शास्त्र की भाषा रिजु (सीधी), काव्य की भाषा वक्र (व्यंजना पूर्ण) होती है। काव्य और शास्त्र दोनों ही भारतीय ज्ञान परम्परा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वैदिक एवं लौकिक संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के तटों को स्पर्श करती हुई हिन्दी तक पहुंचती है। शास्त्रों में जहां विज्ञान और दर्शन वर्णित है वहीं काव्य में परम्परा निहित है। वेद भारतीय संस्कृति, ज्ञान और सभ्यता का मूल है। उन्हीं से समस्त भाषाओं के ज्ञान का स्वरूप है। परम्परा के आधार पर संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश से विकसित होती हिन्दी संस्कृत की ही पुत्री कहलाती है। हिन्दी उसी ज्ञान को विभिन्न विधाओं के माध्यम से प्रत्येक जिज्ञासु तक पहुँचाती है। इसी ज्ञान परम्परा का निर्वहन करते हुए हिन्दी साहित्य अपने पथ पर अग्रसर है।
भारतीय ज्ञान परंपरा ने विश्व को प्रभावित किया है। भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग प्राचीन जीवन मूल्य, पंच महायज्ञ, षोडश संस्कार, भारतीय आयुर्वेदिक, चिकित्सा, विज्ञान, शिक्षा पद्धति, वैदिक ज्ञान उपनिषदीय गूढ़ विधाएँ पुराणों में निहित व्यवहारिक ज्ञान संपूर्ण विश्व को अलौकिक कर रहा है। परंपरा की इस कड़ी में हिन्दी साहित्य ने भी अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। साहित्य मनुष्य की मूल भावनाओं का विषय है। हिन्दी साहित्य में समय-सापेक्ष भावनाएं व्यक्त हुई है। आचार्य शुक्ल के अनुसार- साहित्य जन समूह के हृदय का विकास है।
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Pages:53-54
How to cite this article:
डॉ ममता गोयल, कुमारी आरती "भारतीय ज्ञान परम्परा और हिंदी साहित्य". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 4, 2024, Pages 53-54
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