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VOL. 10, ISSUE 4 (2024)
मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ ‘यथार्थ व संघर्ष की एक गाथा’
Authors
डॉ. बेनज़ीर
Abstract
हिन्दी कविता के क्षेत्र में गजानन माधव मुक्तिबोध ऐसे व्यक्तित्व के रूप में दिखाई देते है जिनका सम्पूर्ण जीवन ही यथार्थ एवं संघर्ष की एक गाथा है । तारसप्तक के कवियों में अज्ञेय और गिरिजाकुमार माथुर के बाद मुक्तिबोध का नाम अधिक महत्वपूर्ण है । मुक्तिबोध ने जिस प्रकार का जीवन जिया ठीक उसी प्रकार अपने जीवन के सम्पूर्ण अनुभव को लेखबद्ध भी किया जिसका प्रमाण मुक्तिबोध की रचना ‘अंधेरे में’ है। मुक्तिबोध की अन्य प्रमुख कृतियाँ जैसे चाँद का मुह टेढ़ा है, काठ का सपना, विपात्र और सतह से उठता आदमी, कामायनीः एक पुनर्विचार, भारतीय इतिहास और संस्कृति, नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबन्ध, नये साहित्य का सौन्दर्य-शास्त्र है । इनमें विशेष ख्याति यदि किसी रचना को मिली है तो वह कविता है ‘अंधेरे में’। यह श्रीकांत वर्मा द्धारा संपादित मुक्तिबोध के प्रथम काव्य संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ (1964) में संकलित अन्तिम कविता है, जिसे उत्तर छायावाद की महत्वपुर्ण काव्य कृति माना जाता है । मुक्तिबोध अपने काव्य की यात्रा में शुरू से ही चिंतनशील रहे हैै इसलिए इनकी रचना पाठक के समक्ष विभिन्न अर्थ खोलती है । जिससे पाठक वर्ग मुक्तिबोध की रचना को विभिन्न अथों एवं निष्कर्षों के आधार पर देखने की कोशिश करता है। मुक्तिबोध को समझना अंधेरे में दीपक दिखाने जैसा है। यही प्रमुख विशेषता मुक्तिबोध को अन्य कवियों तथा लेखकों से अलग करती है।
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Pages:62-64
How to cite this article:
डॉ. बेनज़ीर "मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ ‘यथार्थ व संघर्ष की एक गाथा’". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 4, 2024, Pages 62-64
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