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VOL. 11, ISSUE 1 (2025)
’रामचरितमानस’ एवं’साकेत’ के ’राम’: वर्तमान संदर्भों में
Authors
डॉ. दीपा त्यागी
Abstract
भारत की पावन धरा पर ‘श्रीराम‘ एक ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व है, जो स्मरण मात्र से ही हृदय को आध्यात्मिकता से आप्लावित कर देता है। धर्मोद्धारक मर्यादाशील, सौन्दर्य निधान ‘राम‘ काव्य नायक के रूप में अवतरित होकर युगीन सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक परिस्थितियों एवं उनसे उत्पन्न प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करते हुए मानवतावाद की प्रतिष्ठा करने वाले हैं। ‘रामायण‘ महाकाव्य से लेकर आज तक जितने रामकाव्य लिखे गये, उनमें सर्वाधिक प्रभावशाली एवं उत्कृष्ट रूप में ‘राम‘ का चरित्रांकन करने का श्रेय जाता है लोकनायक तुलसीदास को। महाकवि ने ‘राम‘ में नर एवं नारायणत्व की प्रतिष्ठा करके समाज हित में विविध जीवन मूल्यों की स्थापना करने के लिए ‘रामचरितमानस‘ का सृजन किया। ‘मानस‘ के ‘राम‘ तो दीनोद्धारक पाप विनाशक हैं ही, आधुनिक काल के कवि मैथिलीशरण गुप्त के राम भी ‘‘संदेश नहीं मैं स्वर्ग का लाया, धरा को स्वर्ग बनाये आया‘ का भाव लिए ‘साकेत‘ महाकाव्य रूपी धरा पर अवतरित हुए हैं।
तुलसी का युग हो या मैथिलीशरण गुप्त का दोनों के ही समय दासता की श्रृंखला थी। एक युग में यवनों के कारण धार्मिक कट्टरता हिंसा, विलासिता, दुराचार था तो दूसरे में अंग्रेजी शासन की पशुता थी, जिसके फलस्वरूप समाज व्यवस्था विश्रृंखलित हो गयी थी। ऐसे ही भयावह परिवेश में जीवनदायिनी शक्ति के रूप में ‘राम‘ का अवतरण महाकाव्यों के माध्यम से हुआ। रघुकुल भूषण एवं रघुकुल मणि ‘राम‘ आदर्श एवं आज्ञाकारी पुत्र, कुशल शासक, गुरू के प्रति नतमस्तक उदात भाव संपन्न शिष्य, आदर्श भाई एवं सखा तो थे ही, धरा पर मानवता का परचम लहराने वाले एक परिपूर्ण मानव के रूप में प्रतिष्ठित थे। ‘धर्म बड़ा, धन धाम नहीं’ कहने वाले ‘राम’ शरणागतों की पीड़ा देखकर आहत हुए ‘निसिचर हीन करउँ महिं का प्रण धारण करने में कोई संकोच नहीं किया। राम में कर्त्तव्यपरायणता, शीलता, समर्पण एवं त्याग भावना का प्रमुख कारण उनकी सकारात्मक सोच है जो उन्हें कभी विचलित नहीं होने देती। विमाता द्वारा निष्कासन, भाई का राजतिलक, विश्वामित्र के साथ जाकर राक्षसों का संहार, श्री परशुराम के क्रोध के समक्ष विनम्र होना आदि विविध प्रसंगों में ‘राम‘ सकारात्मक रहे हैं।
वर्तमान समय में हम स्वतंत्र वातावरण में जीवनयापन कर रहे हैं, किसी भी विदेशी की दासता में नहीं हैं फिर भी जीवन में छटपटाहट, एकाकीपन आपसी वैमनस्य, द्वेष, कट्टरता ने जडं़े जमा ली हैं। भौतिक संसाधनों की अंधी दौड़ ने भारतीय संस्कृति की समावेशी प्रवृत्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया है, राजनैतिक एवं आर्थिक विषमताओं ने पारिवारिक संबंधों को भी विघटित कर दिया है। ‘‘प्रातः काल उठि के रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।‘‘ ऐसे ‘राम‘ जिस धरा पर हुए हैं उसी धरा पर आज वृद्ध माता-पिता या तो वृद्धाश्रम में रह रहे हैं या भिक्षावृत्ति करके जीवन व्यतीत कर रहे हैं। सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों की तिलांजलि देने वाले राजनेता व प्रलोभन की राजनीति करते हुए राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त देशद्रोहियों के पक्षधर बनकर राष्ट्र को अवनति की ओर ले जा रहे हैं। निर्दोषों पर प्रहार करने वाले क्रूर आतंकवादी एवं उनके सहयोगी पत्थरबाजों के लिए राम जैसे व्यक्तित्व की आवश्यकता है। राम‘ के ये शब्द ‘भय बिन होय न प्रीति‘‘ हिंसा करने वालों के साथ उनकी भाषा में बात करने के लिए प्रेरित करते हैं। जातिगत विद्वेषता समाप्त करने वाले, शरणागतों के रक्षक राम ने रावण का वध किया-यह युद्ध सत्ता का नहीं था अपितु भौतिकता एवं आध्यात्मिकता का था। वर्तमान में अतिभौतिकता के सर्वनाश की अति आवश्यकता है तभी मानवता की प्रतिष्ठा होगी।
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Pages:75-79
How to cite this article:
डॉ. दीपा त्यागी "’रामचरितमानस’ एवं’साकेत’ के ’राम’: वर्तमान संदर्भों में". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 1, 2025, Pages 75-79
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