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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
समाज-दर्शन के साक्षात विग्रह: कबीर
Authors
डॉ. प्रीति
Abstract
पाश्चात्य अकादमिक जगत ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में स्वयं को श्रेष्ठ मानता रहा है, और औपनिवेशिक मानसिकता के प्रभाव के कारण हमारा अकादमिक समाज भी उसका अनुकरण करने में पीछे नहीं रहा। इस प्रवृत्ति ने न केवल हमारे आत्मगौरव को क्षति पहुँचाई है, बल्कि हमें अंग्रेज़ी बौद्धिक परंपराओं का अनुयायी बना दिया है। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य और संस्कृति के विविध क्षेत्रों में अत्यंत समृद्ध और उन्नत रहा है। हाल के शोधों से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि कई ऐसे दार्शनिक विचार, जिन्हें पश्चिमी दर्शन की उपलब्धि माना जाता है, वे प्राचीन भारतीय परंपरा में पहले से ही विद्यमान रहे हैं।
समाज-दर्शन का क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है। भारतीय चिंतन परंपरा में समाज और व्यक्ति के संबंधों को लेकर गहरे विमर्श हुए हैं। कबीरदास इसका एक सशक्त उदाहरण हैं, जिन्होंने सामाजिक संरचना, भेदभाव और समता पर मौलिक दृष्टि प्रस्तुत की। भले ही समाज-दर्शन एक अनुशासन के रूप में पश्चिम में विकसित हुआ हो, भारतीय समाज में इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं। यह आलेख इसी तथ्य को रेखांकित करने का प्रयास करता है कि भारतीय परंपरा में समाज-दर्शन का स्वरूप कितना प्राचीन और समृद्ध रहा है।
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Pages:13-15
How to cite this article:
डॉ. प्रीति "समाज-दर्शन के साक्षात विग्रह: कबीर". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 13-15
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