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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
हिन्दी निबंध और राष्ट्रवाद की संकल्पना (निबंधकार बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र के विशेष संदर्भ में)
Authors
डॉ. महेन्द्र सिंह मीना
Abstract
हिन्दी निबंधकार बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र के निबंध राष्ट्रीयता संबंधी अवधारणा के साथ तत्कालीन इतिहास दृष्टि में मौजूद परंपरा और आधुनिकता, इतिहास और संस्कृति, धर्म और राष्ट्र के बीच के द्वन्द्व और संबधों को भलीभाँति उजागर करते हैं। भारतीय राष्ट्रवाद के वर्तमान स्वरूप को समझने के लिए जरूरी है कि हम यह समझे; कि नवजागरण के दौर में जाति, वर्ग एवं लैंगिक विषमताओं से युक्त भारतीय राष्ट्रीयता की परिकल्पना कैसे अलग-अलग खांचों में सामने आ रही थी। नवजागरणकालीन उक्त विषयों को ये दोनों निबंधकार किस रूप में देख रहे थे, यह जानना दिलचस्प है।
डॉ. नामवर सिंह अपने आलोचनात्मक लेख ‘हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ’ में भी इस सवाल को रखते हैं कि ‘हिन्दी प्रदेश का नवजागरण हिन्दू-मुस्लिम दो धाराओं में क्यों विभक्त हो गया। जिस प्रदेश में हिन्दू-मुस्लिम दोनों धर्मों के लोग एक साथ मिलकर सन सत्तावन में अंग्रेजी राज के खिलाफ लड़े; वहाँ दस वर्ष बाद ही जो नवजागरण शुरू हुआ, वह हिन्दू-मुस्लिम दो अलग-अलग खानों में कैसे बंट गया।’ इतिहास को किसी खास रंग-ढ़ंग में ढालकर देखने और संबंधित घटना-परिघटनाओं की व्याख्या करने से राष्ट्र का जो स्वरूप उभरता है, उसे समझने के लिए भी इन निबंधकारों की इतिहास दृष्टि की समग्र विश्लेषण जरुरी हो जाता है ।
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Pages:19-22
How to cite this article:
डॉ. महेन्द्र सिंह मीना "हिन्दी निबंध और राष्ट्रवाद की संकल्पना (निबंधकार बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र के विशेष संदर्भ में)". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 19-22
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