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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
भारत में श्रम परिदृश्य एवं महिलाएं: एक विश्लेषण
Authors
कविता चौधरी
Abstract

मनुष्य प्रकृति का अविभाज्य अंग है और सतत रूप से अन्योन्य क्रिया से संलग्न रहता है। मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु निरन्तर क्रियाशील रहता है। ब्रिटानिका कन्साइज एनसाइक्लोपीडिया में श्रम को उत्पादन की तीन साधनों में (पूंजी व भूमि) से एक प्रमुख साधन माना है। जो मानव द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के निर्माण हेतु किए गये सभी शारीरिक एवं मानसिक प्रयासों का प्रतिफल है। हर तरह के श्रम में मनुष्य की शारीरिक, तंत्रकीय और बौद्धिक ऊर्जा खर्च होती है, और अपने श्रम से प्रकृति पर असर डालते हुए मनुष्य अपने आपको बदलता है, भौतिक तथा अस्तित्व संस्कृति को उत्पन्न करता है और अपने शारीरिक तथा आत्मिक क्षमताओं को बढ़ाता है। सदियों से महिलाएं आर्थिक क्रियाकलापों में किसी न किसी रूप में संलग्न रही है। भारत की जनगणना 2011 में कुल श्रमिक संख्या 481.7 लाख है जिसमें 331.9 लाख पुरुष श्रमिक तथा 149.9 लाख महिला श्रमिक है। मुख्यतः श्रमिक महिला ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है तथा कुल श्रमिक जनसंख्या में एक तिहाई पर श्रमिक महिला है। श्रमिक महिला ने सभी क्षेत्रों में अपने दर्ज करायी है। महिला के श्रम करने से परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने लगी तथा साथ ही समाज में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान प्राप्त होने लगा हैं। अब महिलाएं ग्रार्हस्थिक कार्य के अतिरिक्त वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय विकास में भागीदार बन गई हैं।

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Pages:67-69
How to cite this article:
कविता चौधरी "भारत में श्रम परिदृश्य एवं महिलाएं: एक विश्लेषण". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 67-69
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