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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 3 (2025)
धरती के व्याकरण को सस्टेन करने वाला कवि कुमार कृष्ण
Authors
डॉ प्रियंका भारद्वाज
Abstract

हिन्दी की समकालीन कविता इस परिदृश्य से भी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें कम से कम तीन या चार पीढ़ियों के महत्वपूर्ण कवियों की उपस्थिति है जो भारतीय चेतनाओंए चिंताओंए प्रार्थनाओंए आस्थाओं को एक खास समय के अंतर्गत घटित संवेदनाओं के चित्रण को विवरण के साथ प्रस्तुत करती है। एक सच्ची दुनिया के अत्याधुनिक जीवनधर्मी विवरणएजो अपने समय और परिवेश के गहरे मानवीय संवेदनात्मक प्रमाण देते हैं।


  कुमार विकलए आलोक धन्वाएमंगलेश डबरालए अरुण कमलए राजेश जोशीए उद‌य प्रकाशए लीलाधर जगुड़ीए लीलाधर मंडलोईए मदन कश्यप के साथ कुमार कृष्ण एक बड़े कवि हैं जिनका मुहावरा लगातार मानवीय संबंधों की ज़मीन स्पर्श करकेए उसका घर बनाने की ओर अग्रसर है। अनुभवए भावए कथ्य और भाषा मिलकर इस भयानक समय में कुमार कृष्ण के कवि के भीतर विश्वास की ऐसी शक़्ल बनाते हैं जिसके क्राफ़्ट से कवि पूरी ताकत के साथ असंवेदनशील दुनिया की भुरभुरी सच्चाई को सबके सामने व्यक्त करता है। एक मरणोन्मुखी समाज में हम जी रहे हैं और ऊपरी सतह पर चीजान के सहज और सही होने की दुहाई दे रहे हैं। जबकि धरातल पर हमें मालूम है कि जीवन वस्तुतः जटिल से जटिलतर होता जा रहा है। साहित्य की मूलगामी अवधारणाएँ गाँधीवादए मार्कस्वाद ए पूंजीवाद से निकल कर पहले आतंकवादएनवसाम्राजयवादए उपभोक्तावादए बाज़ारवाद आदि वैचारिक बहसों की ओर केन्द्रित रही और वर्तमान में जैविक संक्रमण के जाल में फंसकर विश्वग्राम यळसवइंस टपससंहमद्ध के स्वप्न को विकेन्द्रित होकर देखने के लिए विवश है। ऐसे विवशए संत्रस्तए भयानक एवम् आतंकित समय में कवि और कविता दोनों ही बाहरी आक्रमणों के वैचारिक हमलों से जूझ रहे हैं। इन तमाम खतरों के बावजूद समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षरए धूमिल के मुहावरे को नई धारए नई गति देने वाले कवि कुमार कृष्ण जटिल समय के बोध को अपनी कविताओं के माध्यम से पूरी इन्वाल्वमेंट के साथ विवेचित कर रहे हैं। अपनी काव्यगत प्रतिक्रियाओं के माध्यम से कवि आतंकित संसार के ब्लदपबपेउ यनिराशवादद्ध में फँसे मनुष्य को मुक्त कर उनमें प्रेमएआस्थाए विश्वासए संतोषए सौंदर्यएआनंद की स्थितियों के बीज बोता है। 

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Pages:60-62
How to cite this article:
डॉ प्रियंका भारद्वाज "धरती के व्याकरण को सस्टेन करने वाला कवि कुमार कृष्ण". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 3, 2025, Pages 60-62
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