यह शोध-आलेख डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा 'मणिकर्णिका' और 'मुर्दहिया’ में वैश्विक चेतना तथा लेखक की वैचारिकी के सक्रिय निर्माण का विश्लेषण करता है। आत्मकथा दर्शाती है कि भूमंडलीकरण के औपचारिक आगमन से पूर्व ही, भारत विश्व से जुड़ा था, जिसके प्रमाण स्वरूप रूस से 'सामूहिक खेती' जैसे विचारों का उल्लेख मिलता है, जो देश की वैश्विक भूमिका को पुष्ट करता है। लेखक की चेतना को आकार देने में बुद्ध, मार्क्स और अंबेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव रहा है। मार्क्सवाद के वर्ग संघर्ष ने उन्हें सर्वाधिक प्रेरित किया, जिससे उन्होंने इन सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया। यह खोज लेखक की सामाजिक-राजनीतिक चेतना के लिए निर्णायक सिद्ध हुई। यह शोध-आलेख स्थापित करता है कि आत्मकथा वैश्विक संदर्भों और सामाजिक मुक्ति के दर्शन के बीच वैचारिक संश्लेषण का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
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