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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 11, ISSUE 4 (2025)
लोक-साहित्य में अभिव्यक्त गिरमिटिया प्रथा वा जन-स्मृति में काला पानी की गूँज: एक ऐतिहासिक अवलोकन
Authors
डॉ. अभिषेक सौरभ
Abstract
अपने वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में काला पानी का सच, गिरमिटिया प्रथा की अमानवीयता और गिरमिटिया मजदूरों की उन व्यथाओं से सीधी तौर पर जुड़ी हुई है, जिन व्यथा-कथाओं में औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान अंग्रेजों के दवाब में या उनके द्वारा भ्रांतिमान तरीके से बहला-फुसलाकर, प्रलोभन देकर भारतीय नर-नारी अपने देश की मिट्टी से हजारों-हज़ार मील दूर ऊसर-बंजर ब्रिटिश अधिकार वाले बियाबान द्वीपों-प्रायद्वीपों पर ले जाये गये और उन निर्जन प्रान्तों को बिना किसी सुविधा-सहूलियत के, एक तरह से नये सिरे से उन्हें बसाने की महती जिम्मेवारी उन पर आ पड़ी। ब्रिटिश उपनिवेश के साथ-साथ डच, फ्रेंच और डैनिश उपनिवेशों की उन अपरिचित, बीहड़ भूमियों पर हाड़-तोड़ मेहनत के द्वारा ईख, कॉफी और कपास की खेती करने से लेकर वतन-वापसी की आशा में सालों-साल व्याकुलता में गुजार देना ही उनकी नियति बन गयी। औपनिवेशिक-शासन ने भारतीयों के सस्ते मजदूर होने का बेजा फ़ायदा उठाया और अपने उपनिवेश वाले तमाम देशों में उन्हें काम करने के लिए ले गए। इन्हें ‘एग्रीमेंट’ पर लाया गया मजदूर कहा गया। एग्रीमेंट शब्द शनैः शनैः ‘गिरमिट’ और पुनः ‘गिरमिटिया’ में बदल गया। गिरमिटिया की इस कड़ी में ‘पहला गिरमिटिया’ कहे जाने वाले महात्मा गाँधी से लेकर प्रवासी भारतियों की एक अंतहीन श्रृंखला विद्यमान है। प्रस्तुत आलेख में इसी गिरमिटिया प्रथा का ऐतिहासिक अवलोकन प्रस्तुत है जो पूरब की भूमि और इस भूमि के लालों-ललनाओं का पाश्चात्य जगत के लोगों से इच्छुक-अनिच्छुक मुठभेड़ से प्रारम्भ होकर विदेशी सरजमीं और कैरेबियाई प्रायद्वीपों से लेकर प्रशांत महासागर की अतल गोद में बसे द्विपीय देशों तक की हुकूमत भारतवंशियों के हाथों में सौंप दिए जाने के प्रारब्ध का निर्माण करती है और ऐतिहासिक स्तर पर शोषणकारी व्यवस्था से लोहा लेते हुए भारतवंशियों की बेमिसाल इच्छाशक्ति व दुर्लभ जीवनशक्ति का अभूतपूर्व उदाहरण प्रस्तुत करती है।
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Pages:88-92
How to cite this article:
डॉ. अभिषेक सौरभ "लोक-साहित्य में अभिव्यक्त गिरमिटिया प्रथा वा जन-स्मृति में काला पानी की गूँज: एक ऐतिहासिक अवलोकन". International Journal of Hindi Research, Vol 11, Issue 4, 2025, Pages 88-92
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