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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
बाल विमर्श और डॉ. परशुराम शुक्ल की बाल कहानियाँ
Authors
वसुंधरा देसाई
Abstract
मानव जाति की उत्पत्ति से लेकर हर काल, हर युग में बचपन एक जैसा ही रहा है, ना बच्चों की किलकारियाँ बदली है, ना ही उनका हँसना और ना रोना ।अगर कुछ बदला है, तो वह है उन्हें मिलने वाला परिवेश और संस्कार ।हर देश और वहाँ की संस्कृति के अनुसार बच्चों को संस्कार मिलते हैं ।यही बच्चे भविष्य के जिम्मेदार नागरिक बनते हैं ।तो अगर मानव जाति का उज्ज्वल  भविष्य किसी पर निर्भर है, तो वह है बच्चों को मिलने वाले पारिवारिक और सामाजिक परिवेश पर ।यह समाज और परिवार की ही जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को एक हँसता-खेलता सुस्कारित बचपन दे|कई देशों में बच्चों को देश की अमूल्य संपत्ति माना जाता है ।दुर्भाग्यवश भारत में उन्हें केवल एक मानव की संतान की दृष्टि से देखा जाता है ।कुछ परिवारों में बच्चों को अच्छे संस्कार देना परम कर्तव्य माना जाता है| नि:संदेह वह बच्चे बहुत भाग्यशाली होते हैं ।किंतु सभी बच्चों के नसीब में अच्छा परिवेश और संस्कार नहीं होते ।ऐसे बच्चों के लिए ही बाल साहित्य का उत्तरदायित्व बढ़ता है ।बच्चों को मनोरंजन के माध्यम से नैतिक संस्कार देना बाल साहित्यकार का परम कर्तव्य है । संतोष की बात यह है कि इस आधुनिक काल में भारत के कई बाल साहित्यकारों को अपने इस कर्तव्य का एहसास है, जो उनके लेखन से झलकता है| कलम के धनी डॉ. परशुराम शुक्ल द्वारा लिखित बाल कथा साहित्य समग्र के तेरह संग्रहों में उन्होंने मनोरंजन के माध्यम से बच्चों को उचित नैतिक मूल्यों के संस्कार देने का सफल प्रयास किया है|
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Pages:117-119
How to cite this article:
वसुंधरा देसाई "बाल विमर्श और डॉ. परशुराम शुक्ल की बाल कहानियाँ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 117-119
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