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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
कविता और सत्ता का संवाद: समकालीन हिंदी काव्य में राजनीतिक यथार्थ
Authors
डॉ. नितिन पाटील
Abstract
राजनीति और समाज के पारस्परिक संबंधों के बिना न तो सामाजिक परिवर्तन संभव है और न ही साहित्य में क्रांतिकारी चेतना का विकास। समकालीन हिंदी कविता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि कवि अपने समय की राजनीतिक संरचना और सत्ता-तंत्र से गहरे रूप में संबद्ध रहा है। समकालीन कवियों ने अपने युग की राजनीतिक व्यवस्था को भली-भाँति पहचानते हुए, अपने काव्य में राजनीतिक विद्रूपताओं तथा उनके परिणामस्वरूप उत्पन्न सामान्य जन के शोषण को सशक्त रूप में अभिव्यक्त किया है। यह अभिव्यक्ति कहीं व्यंग्य के माध्यम से तो कहीं तीखे आलोचनात्मक प्रहारों के रूप में सामने आती है, जिसका उद्देश्य सामाजिक चेतना का विकास करना रहा है। समकालीन हिंदी कविता का कालखंड भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय राजनीतिक संकटों से गहराई से जुड़ा हुआ रहा है। इस दौर के कवियों ने समाज को राजनीतिक अर्थवत्ता प्रदान करते हुए समवेत सामाजिक मुक्ति की दिशा में काव्य को अग्रसर किया। उन्होंने अपने कवि-कर्म की सामाजिक भूमिका को पहचानते हुए, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन किया तथा जनमानस को जागृत करने का निरंतर प्रयास किया। विशेष रूप से समकालीन हिंदी कविता (1990–2000) के कालखंड में राजनीतिक विद्रूपताओं, भारतीय लोकतंत्र की संरचनात्मक कमजोरियों, चुनावी प्रहसनों तथा भ्रष्टाचार जैसे विषयों को केंद्रीय स्थान प्राप्त हुआ। इस काल के कवियों ने भारतीय राजनीति में निहित कूटनीति, अवसरवाद, स्वार्थवृत्ति और सत्ता-संघर्ष को व्यंग्यात्मक एवं आलोचनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया है। इस प्रकार समकालीन कविता न केवल राजनीतिक यथार्थ को उजागर करती है, बल्कि जनता में राजनीतिक और सामाजिक चेतना उत्पन्न करने का भी महत्वपूर्ण कार्य करती है।
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Pages:83-87
How to cite this article:
डॉ. नितिन पाटील "कविता और सत्ता का संवाद: समकालीन हिंदी काव्य में राजनीतिक यथार्थ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 83-87
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