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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
अधूरी उल्टी आत्मकथा: एक अनूठा प्रयोग
Authors
डॉ. मनीष कुमार जैन
Abstract
डॉ. हुकमचंद भारिल्ल द्वारा रचित ‘अधूरी उल्टी आत्मकथा’ अपने शिल्प (उल्टा क्रम) और विषयवस्तु (सार्वजनिक जीवन बनाम व्यक्तिगत जीवन) की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है।
प्रायः आत्मकथाएँ जन्म से मृत्यु/वर्तमान की ओर बढ़ती हैं, लेकिन डॉ. भारिल्ल ने 2022 से शुरू कर 1958 तक की यात्रा की है। यह प्रयोग न केवल रोचक है, बल्कि यह दर्शाता है कि वृद्ध अवस्था में व्यक्ति जब पीछे मुड़कर देखता है, तो स्मृतियाँ इसी क्रम में खुलती हैं।
लेखक ने स्वीकार किया है कि बचपन के अभावों को लिखने में उन्हें कोई सार नहीं दिखा। उनका यह कहना कि ‘आत्मकथा का अधूरा होना उसकी प्रकृति है’, बनारसीदास जैन के ‘अर्द्धकथानक’ की परंपरा को आधुनिक संदर्भ देता है। यहाँ ‘अधूरा’ शब्द केवल कालखंड की कमी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनासक्ति का भी प्रतीक है।
इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता जो आपने बताई, वह है व्यक्तिगत चित्रण का अभाव। इसमें परिवार, मित्र या निजी राग-द्वेष के स्थान पर महत्व देते हैं स्वयं के सार्वजनिक जीवन को। सार्वजनिक जीवन में संस्थागत संघर्ष (टोडरमल स्मारक ट्रस्ट), वैचारिक क्रांतियाँ (नयचक्र, क्रमबद्धपर्याय), सामाजिक चुनौतियाँ (जिनवाणी सुरक्षा आंदोलन), संपादन यात्रा (आत्मधर्म और वीतराग विज्ञान), रचनात्मक प्रबंधन और संकलन आदि प्रमुख हैं।
यह आत्मकथा घटनाओं का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि लेखक के जीवनभर के संपादकीय लेखों और वक्तव्यों का एक सुगठित संयोजन है। यह शैली बताती है कि एक मनीषी का चिंतन समय के साथ कितना स्थिर और तर्कसंगत रहा है कि पुराने लेख आज आत्मकथा का जीवंत हिस्सा बन गए।
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Pages:245-247
How to cite this article:
डॉ. मनीष कुमार जैन "अधूरी उल्टी आत्मकथा: एक अनूठा प्रयोग". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 245-247
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