ARCHIVES
VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
लगान, संघर्ष और स्वराज: संयुक्त प्रांत में किसान आंदोलन का संक्रमणकाल (1937–1947)
Authors
डॉ. मुनेन्द्र सिंह
Abstract
सन 1937 से 1947 तक का दशक संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में किसान संघर्षों के इतिहास में एक गहरे और बहुआयामी संक्रमणकाल के रूप में उभरता है। यह कालखंड केवल कृषकों की पारंपरिक आर्थिक पीड़ाओं—जैसे अत्यधिक लगान, बेदखली की बढ़ती घटनाएँ, साहूकारी ऋण का बोझ और फसली अस्थिरता—का स्वाभाविक परिणाम नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक राजस्व नीतियों, जमींदारी भू-संरचना, प्रांतीय स्वायत्तता के अंतर्गत बनी कांग्रेस सरकारों की सीमाओं, द्वितीय विश्वयुद्ध के आर्थिक दुष्प्रभावों तथा राष्ट्रीय राजनीति के तीव्र होते विमर्शों के संयुक्त प्रभाव से निर्मित एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल का काल था। 1937 में कांग्रेस मंत्रालय के गठन ने ग्रामीण समाज में सुधार की आशा जगाई, किंतु औपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचे, संवैधानिक प्रतिबंधों और स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्गों के प्रभाव के कारण भूमि-संबंधी संरचनात्मक परिवर्तन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सके। परिणामस्वरूप किसानों के भीतर निराशा और असंतोष का संचय हुआ, जिसने संगठित किसान सभाओं और ग्रामीण राजनीतिक चेतना के विस्तार को प्रेरित किया। इस शोध में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार किसानों ने अपने पारंपरिक आर्थिक प्रश्नों—विशेषतः लगान की दरों, बेदखली के विरुद्ध सुरक्षा, ऋण-राहत और भू-अधिकार—को केवल स्थानीय प्रशासनिक शिकायतों तक सीमित न रखकर उन्हें राजनीतिक अधिकार, सामाजिक न्याय और स्वराज की व्यापक अवधारणा से जोड़ा। सन 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारंभ के साथ ही मूल्य-वृद्धि, अनिवार्य आपूर्ति, खाद्यान्न संकट और ग्रामीण संसाधनों के दोहन ने औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष को और तीव्र किया। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की सक्रिय भागीदारी ने यह संकेत दिया कि उनका संघर्ष अब केवल जमींदारों के विरुद्ध आर्थिक प्रतिरोध नहीं रहा, बल्कि औपनिवेशिक राज्य की वैधता को चुनौती देने वाला राजनीतिक हस्तक्षेप बन चुका था। इस प्रक्रिया में किसान संगठनों ने राष्ट्रीय आंदोलन के साथ सहयोग और आलोचनात्मक दूरी—दोनों प्रकार की रणनीतियाँ अपनाईं, जिससे ग्रामीण राजनीति का एक विशिष्ट स्वरूप विकसित हुआ। विदेशी इतिहासकारों—जैसे Eric Stokes द्वारा ग्रामीण सामाजिक संरचना और कृषक राजनीति के विश्लेषण, Ranajit Guha द्वारा किसान चेतना की स्वायत्तता की अवधारणा, Judith Brown द्वारा कांग्रेस की नीतिगत सीमाओं का मूल्यांकन, Christopher Bayly द्वारा औपनिवेशिक-सामंती गठजोड़ की व्याख्या, Tom Brass द्वारा वर्गीय संरचना के विश्लेषण, तथा D. A. Low और David Arnold द्वारा औपनिवेशिक राज्य और युद्धकालीन नीतियों के अध्ययन—के आलोक में यह शोध यह प्रतिपादित करता है कि 1937–47 का किसान आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का मात्र सहायक या परिशिष्ट नहीं था। इसके विपरीत, यह एक स्वायत्त, बहुस्तरीय और ऐतिहासिक रूप से निर्णायक ग्रामीण प्रतिरोध प्रक्रिया थी, जिसने औपनिवेशिक सत्ता-संरचनाओं और स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्गों दोनों को चुनौती दी।
Download
Pages:56-63
How to cite this article:
डॉ. मुनेन्द्र सिंह "लगान, संघर्ष और स्वराज: संयुक्त प्रांत में किसान आंदोलन का संक्रमणकाल (1937–1947)". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 56-63
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

